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श्रीमद्भगवद्गीता · अक्षर ब्रह्म योग

श्लोक 12

अक्षर ब्रह्म योग · Akshara Brahma Yoga

मूल पाठ

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च | मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्मका उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोड़कर जाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।

English Meaning

Having closed all the gates, confined the mind in the heart and fixed the life-breath in the head, engaged in the practice of concentration.

Having closed all the gates, confined the mind in the heart and fixed the life-breath in the head, engaged in the practice of concentration.

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