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श्रीमद्भगवद्गीता · राजविद्या राजगुह्य योग

श्लोक 19

राजविद्या राजगुह्य योग · Rajavidya Rajaguhya Yoga

मूल पाठ

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च | अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे अर्जुन ! (संसारके हितके लिये) मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, जलको ग्रहण करता हूँ और फिर उस जलको वर्षारूपसे बरसा देता हूँ। (और तो क्या कहूँ) अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

हे अर्जुन ! (संसारके हितके लिये) मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, जलको ग्रहण करता हूँ और फिर उस जलको वर्षारूपसे बरसा देता हूँ। (और तो क्या कहूँ) अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।

English Meaning

(As the sun) I give heat; I withhold and send forth the rain; I am immortality and also death, existence and non-existence, O Arjuna.

(As the sun) I give heat; I withhold and send forth the rain; I am immortality and also death, existence and non-existence, O Arjuna.

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