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श्रीमद्भगवद्गीता · राजविद्या राजगुह्य योग

श्लोक 6

राजविद्या राजगुह्य योग · Rajavidya Rajaguhya Yoga

मूल पाठ

यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् | तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं -- ऐसा तुम मान लो।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं -- ऐसा तुम मान लो।

English Meaning

As the mighty wind, moving everywhere, rests always in the ether, even so, know thou that all beings rest in Me.

As the mighty wind, moving everywhere, rests always in the ether, even so, know thou that all beings rest in Me.

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