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श्रीमद्भगवद्गीता · राजविद्या राजगुह्य योग

श्लोक 32

राजविद्या राजगुह्य योग · Rajavidya Rajaguhya Yoga

मूल पाठ

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः | स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे पृथानन्दन ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

हे पृथानन्दन ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं।

English Meaning

For, taking refuge in Me, they also who, O Arjuna, may be of a sinful birth women, Vaisyas as well as Sudras attain the Supreme Goal.

For, taking refuge in Me, they also who, O Arjuna, may be of a sinful birth women, Vaisyas as well as Sudras attain the Supreme Goal.

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