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श्रीलिङ्गमहापुराण · उत्तरभाग

अध्याय 45जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छाद्धका विधान

उत्तरभाग · Uttar Bhag

अध्याय 45

जीवितावस्थामें किये जानेवाले जीवच्छाद्धका विधान

उत्तरभाग

सम्पूर्ण अध्याय

हिन्दी अनुवाद और व्याख्या

ऋषिगण बोले--[हे सूतजी!] इस प्रकार आपने कल्याणकारी सोलह दानोंके विषयमें बता दिया, अब आप हमें जीवच्छाद्धकी विधि बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १ ॥

सूतजी बोले--मैं सर्वसम्मत जीवच्छाद्ध-विधिका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। इसे पूर्वकाले देवदेव ब्रह्माने स्वायम्भुव मनु, पूज्य वसिष्ठ, भृगु तथा भार्गवको बताया था। आपलोग पूर्ण मनोयोगसे समस्त सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले उस श्राद्धके विषयमें सुनें। हे सुव्रतो! मैं अतिश्रेष्ठ श्राद्धमार्गकी विधि, साक्षात् श्राद्धके योग्य पुरुषोंका क्रम और जीवच्छाद्धकी विशेष विधिका भी वर्णन कर रहा हूँ ॥ २-४ ॥ मनुष्यको वृद्धावस्थामें पर्वतपर, नदीके तटपर, वनमें अथवा देवालयमें प्रयत्नपूर्वक जीवच्छाद्ध करना चाहिये। जीवच्छाद्ध कर लेनेपर प्राणी जीवित रहते ही मुक्त हो जाता है; वह कर्म करे अथवा न करे, ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी, श्रोत्रिय हो अथवा अश्रोत्रिय, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य कोई भी हो--वह योगमार्गको प्राप्त योगीकी भाँति मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५-७ ॥ * इस अध्यायमें जीवच्छाद्धका माहात्म्य एवं संक्षेपमें श्राद्धकी विधि आयी है, किंतु वर्तमानमें जीवच्छाद्धकी जो प्रक्रिया उपलब्ध होती है, वह इससे भिन्न है। गीताप्रेससे 'जीवच्छाद्धपद्धति' नामसे एक पुस्तक प्रकाशित है, जिसमें जीवच्छाद्ध-सम्बन्धी समस्त प्रक्रिया पूर्णरूपसे उपलब्ध है, जिज्ञासुजनोंको उसका अवलोकन करना चाहिये। [जीवच्छाद्धकी विधि बतायी जाती है--] गन्ध, वर्ण, रस आदिके द्वारा भूमिकी विधिवत् परीक्षा करके यत्नपूर्वक शल्य (दोष) निकालकर उस भूमिपर बालूकी वेदी बनाये और उस वेदीके मध्य एक हाथ-प्रमाणका लम्बा-चौड़ा सुन्दर कुण्ड अथवा अरत्नि (कुहनीसे कनिष्ठिका अँगुलीतककी दूरी)-प्रमाणवाला स्थण्डिल बनाये। उसे बार-बार अत्यन्त स्निग्ध (चिकना) करके गोमयसे लीपकर अपने-अपने वेदोंकी शाखाओंके परम्परागत मन्त्रोंसे अग्निस्थापन करके तीन समिधाएँ लेकर हूयमान सभी देवताओंका आवाहनकर पुनः कुशास्तरण करे। विधिवत् पूजन करके स्थण्डिलपर अग्निमें यज्ञकी समिधाओंके द्वारा होम करे; पहले समिधासे हवन करके बादमें चरुसे तथा घृतसे पृथक्-पृथक् हवन करे। आज्यस्थालीमें शुद्ध किये हुए घृतसे तत्त्वभूतोंको मनसे विचार करके चारों ओर अलग-अलग हवन करना चाहिये ॥ ८-१३ ॥ [पूजन-हवनमन्त्रोंको क्रमशः बताया जाता है--] ॐ भूः ब्रह्मणे नमः। ॐ भूः ब्रह्मणे स्वाहा। ॐ भुवः विष्णवे नमः। ॐ भुवः विष्णवे स्वाहा। ॐ स्वः रुद्राय नमः। ॐ स्वः रुद्राय स्वाहा। ॐ महः ईश्वराय नमः। ॐ महः ईश्वराय स्वाहा। ॐ जनः प्रकृतये नमः। ॐ जनः प्रकृत्यै स्वाहा। ॐ तपः मुद्गलाय नमः। ॐ तपः मुद्गलाय स्वाहा। ॐ ऋतं पुरुषाय नमः। ॐ ऋतं पुरुषाय स्वाहा। ॐ सत्यं शिवाय नमः। ॐ सत्यं शिवाय स्वाहा। ॐ शर्वं धरां मे गोपाय प्राणे गन्धं शर्वाय देवाय भूर्नमः। ॐ शर्वं धरां मे गोपाय प्राणे गन्धं शर्वाय भूः स्वाहा। ॐ शर्वं धरां मे गोपाय प्राणे गन्धं शर्वस्य देवस्य पत्न्यै भूर्नमः। ॐ शर्वं धरां मे गोपाय प्राणे गन्धं शर्वपत्न्यै भूः स्वाहा। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवो नमः। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवः स्वाहा। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य देवस्य पत्न्यै भुवो नमः। ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य पत्न्यै भुवः स्वाहा। ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वरों नमः। ॐ रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वः स्वाहा। रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य पत्न्यै स्वरों नमः। रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य देवस्य पत्न्यै स्वः स्वाहा। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महर्नमः। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महः स्वाहा। उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महरों नमः। ॐ उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महः स्वाहा। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनो नमः। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनः स्वाहा। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य पत्न्यै जनो नमः। भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य देवस्य पत्न्यै जनः स्वाहा। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपो नमः। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपः स्वाहा। रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपो नमः। ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपः स्वाहा। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं नमः। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं स्वाहा। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं नमः। महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवस्य पत्न्यै ऋतं स्वाहा। पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवाय सत्यं नमः। पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवाय सत्यं स्वाहा। ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं नमः। ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं स्वाहा। ॐ शिवाय नमः। ॐ शिवाय सत्यं स्वाहा ॥ १४-६३ ॥ इस प्रकार सर्वप्रथम विरिंचि (ब्रह्मा) आदि [पचीस] देवताओंका पूजन करके पूर्वोक्त क्रमसे मोक्षके लिये हवन करना चाहिये। हे सुव्रतो! विरिंचि आदिका पूजन-हवन सृष्टिक्रमसे करनेके अनन्तर क्रमसे पूर्वकी भाँति पशुपतिकी पत्नी तथा पशुपतिका सम्यक् पूजन करके समाहितचित्त होकर मन्त्रोंके द्वारा चरु, आज्य और समिधासे हवन करना चाहिये ॥ ६४-६६ ॥ [हवनके मन्त्र इस प्रकार हैं--] ॐ शर्वं धरां मे छिन्धि प्राणे गन्धं छिन्धि मेघं जहि भूः स्वाहा। भुवः स्वाहा। स्वः स्वाहा। भूर्भुवः स्वः स्वाहा--इन मन्त्रोंके द्वारा समिधा आदिसे अथवा केवल घृतसे एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ पृथक्-पृथक् आहुतियाँ प्रदान करके विरजासंज्ञक दीक्षामन्त्रोंके द्वारा घृतसे आहुति देनी चाहिये। तत्पश्चात् प्राणादि मन्त्रोंके द्वारा केवल घृतसे एक सौ आठ आहुति डालनी चाहिये। [प्राणादि मन्त्र ये हैं--] ॐ प्राणे निविष्टोऽमृतं जुहोमि शिवो मा विशाप्रदाहाय प्राणाय स्वाहा। प्राणाधिपतये रुद्राय वृषान्तकाय स्वाहा। ॐ भूः स्वाहा। ॐ भुवः स्वाहा। ॐ स्वः स्वाहा। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा ॥ ६७-७८ ॥ इस प्रकार श्राद्धोक्त रीतिसे यथाक्रम हवन करे। तदनन्तर सातवें दिन योगियों तथा श्राद्धयोग्य ब्राह्मणोंको भोजन कराये। शर्व आदि अष्ट देवताओंके नामोंसे आठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें वस्त्र, आभूषण, कम्बल, वाहन, शय्या, यान, कांस्य-ताम्र आदिके पात्र, सोना, चाँदी, गो, तिल, भूमि, धन और दासीदाससमूह--यह सब प्रदान करना चाहिये और दक्षिणा भी देनी चाहिये। शर्व आदि अष्टमूर्तियोंके प्रकारसे आठ पिण्ड भी प्रदान करे। हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा दे अथवा एक ही योगपरायण, भस्मनिष्ठ तथा जितेन्द्रिय [शिवभक्त]-को ही भोजन कराये। तीन दिनतक भगवान् रुद्रको महाचरु निवेदित करे। जीवच्छाद्धके विषयमें शास्त्रवर्णित विशेष बातें मैंने बता दीं-- ॥ ७९-८३ १/२ ॥ जीवच्छाद्ध करनेवाला व्यक्ति नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको करे अथवा त्याग दे और उसके मृत हो जानेपर कोई उसका श्राद्ध करे अथवा न करे; क्योंकि वह तो स्वयं जीवन्मुक्त है। बन्धु-बान्धवके मर जानेपर उसे शौचाशौच तथा सूतक नहीं लगता, वह स्नानमात्रसे शुद्ध हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। अपनी पत्नीसे बादमें यदि अपना पुत्र उत्पन्न हो जाय, तो उसका सम्पूर्ण संस्कार करना चाहिये; वह पुत्र भी ब्रह्मवेत्ता होता है। हे सुव्रतो! यदि बादमें उस महात्माके कन्या उत्पन्न हुई, तो उस कन्याको एकपर्णा अथवा अपर्णा (पार्वती)-के समान जानना चाहिये। उस कन्याके वंशमें उत्पन्न होनेवाले भी मुक्त हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। उस व्यक्तिके इस [जीवच्छाद्ध] कर्मके द्वारा उसके मातृपक्ष तथा पितृपक्षके पितर भी नरकसे मुक्त हो जाते हैं। [जीवच्छाद्ध कर चुके] ऐसे द्विजके मर जानेपर उसे भूमिमें गाड़ दिया जाय अथवा उसका दाह-संस्कार कर दिया जाय; पुत्रके द्वारा उसका सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कृत्य करनेसे उसे कोई दोष नहीं लगता है। मृत्युके अनन्तर उसके लिये कोई क्रिया आवश्यक नहीं है ॥ ८४-९० १/२ ॥ [सूतजीने कहा--हे ऋषियो!] ब्रह्माजीने पुण्यात्मा मुनियोंसे यह सब कहा था; फिर उन बुद्धिमान् ब्रह्माने इसे सनत्कुमारको बताया। तदनन्तर ब्रह्मपुत्र उन सनत्कुमारने कृष्णद्वैपायन व्यासजीसे इसका कथन किया। इसके अनन्तर उन बुद्धिसम्पन्न भगवान् वेदव्यासकी कृपासे मैंने इसे जाना और उन्हींके आदेशसे ब्रह्मसिद्धि प्रदान करनेवाला यह सम्पूर्ण रहस्य मैंने आप लोगोंको बताया। हे सुव्रतो! इसे किसी मुनिपुत्रको ही प्रदान करना चाहिये, अभक्तको नहीं ॥ ९१-९४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'जीवच्छाद्धविधि' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥

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