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श्रीलिङ्गमहापुराण · उत्तरभाग

अध्याय 46लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन और लिङ्गार्चनसे सभीके पूजनका फलनिरूपण

उत्तरभाग · Uttar Bhag

अध्याय 46

लिङ्गमें सभी देवताओंकी स्थितिका वर्णन और लिङ्गार्चनसे सभीके पूजनका फलनिरूपण

उत्तरभाग

सम्पूर्ण अध्याय

हिन्दी अनुवाद और व्याख्या

ऋषिगण बोले--हे विशाल बुद्धिवाले सूतजी, हे रोमहर्षण! आपने अज्ञानियोंके भी मोक्षके लिये हमलोगोंसे जीवच्छाद्धकी विधिका वर्णन किया। हे सुव्रत! रुद्र, आदित्य, वसु, इन्द्र आदि देवता शिवजीकी लिङ्गमूर्तिकी सुन्दर प्रतिष्ठा किस प्रकार होती है; विष्णु, इन्द्रदेव, भगवान् ब्रह्मा, अग्नि, यम, निर्ऋति, महातेजस्वी वरुण, वायु, सोम, यक्ष, अमित आत्मावाले कुबेर, ईशान तथा पृथ्वीकी उत्तम प्रतिष्ठा कैसे की जाती है; दुर्गा, शिवा, हैमवती, कार्तिकेय, गणनाथ नन्दी तथा अन्य देवताओं और गणोंकी शोभन प्रतिष्ठा किस प्रकार होती है, इनकी प्रतिष्ठा-विधिका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ॥ १-६ ॥ हे सुव्रत! आप समस्त अर्थतत्त्वके ज्ञाता और रुद्रभक्त हैं। आप कृष्णद्वैपायन व्यासकी साक्षात् दूसरी मूर्ति हैं। 'सुमन्तु, जैमिनि तथा पैल परम ऋषिके रूपोंमें प्रतिष्ठित हैं; रोमहर्षण उन्हींके सदृश गुरुभक्ति करनेमें समर्थ हैं--इस प्रकारकी विशद वाणी गंगातटपर व्यासजीने स्वयं प्रकट की थी।' उन महातेजस्वीके समान अथवा उन्हींके रूपवाले आप उनके शिष्य हैं। पृथ्वीतलपर व्यासजीके शिष्योंमें आप वैशम्पायनके समान हैं, अतः इस समय आप हमलोगोंको सम्पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ७-१० ॥ ऐसा कहकर उन सभीके शान्त हो जानेपर मुनियों तथा उन सूतजीके समक्ष विस्मयकारी घटना हुई, अन्तरिक्षमें साक्षात् महादेवी सरस्वती इस वाणीके साथ प्रकट हुईं कि 'मुनियोंका यह प्रश्न समीचीन है, सम्पूर्ण लोक लिङ्गमय है और सब कुछ लिङ्गमें ही प्रतिष्ठित है, अतः सब कुछ छोड़कर उसीकी स्थापना तथा पूजन करना चाहिये। लिङ्गस्थापनरूप पुण्यकर्ममें स्थापित अत्यन्त विस्तृत खड्गके द्वारा शीघ्र ही ब्रह्माण्डका भेदन करके [वह लिङ्गस्थापक] निःशंक भावसे मुक्त हो जाता है' ॥ ११-१४ ॥ हे द्विजो! लिङ्गमूर्ति महेश्वर शिवकी स्थापना करके जैसे विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, यम, वरुण तथा कुबेर ईश्वर (स्वामी) हो गये, वैसे ही अन्य लोग भी अपने-अपने पक्षोंमें प्रधान हुए हैं। ब्रह्मा, शम्भु, भगवान् विष्णु, देवी रमा, धरा, लक्ष्मी, धृति, स्मृति, प्रज्ञा, धरा, दुर्गा, शची, सभी रुद्र, सभी वसु, कार्तिकेय, विशाख, शाख, भगवान् नैगमेश, समस्त लोकपाल, ग्रह, नन्दी आदि गण, प्रभु गणपति, पितर, मुनिगण, कान्तिमान् कुबेर आदि यक्ष, सभी आदित्य, वसु, सांख्य, वैद्यश्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार, विश्वेदेव, साध्यगण, पशु, पक्षी और मृग--ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सब कुछ लिङ्गमें प्रतिष्ठित है, अतः सब कुछ छोड़कर यत्नपूर्वक यदि शाश्वत लिङ्गकी स्थापना करे, तो सबकी स्थापना हो जाती है और यदि पूजन करे, तो सबकी पूजा हो जाती है ॥ १५-२१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लिङ्गपूजनवर्णन' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥

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