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क्या है

पितृकर्म क्या है?(11)

पितृकर्म का अर्थपितृकर्म क्या है?पितृकर्म का महत्व
सरल उत्तर

आदित्य पितृकर्म में प्रपितामह के अधिष्ठाता हैं और ज्ञान, प्रकाश, आध्यात्मिक उन्नति तथा मोक्ष से जुड़े हैं।

स्रोत प्रश्न: पितृकर्म में आदित्यों की भूमिका क्या है? →
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पुरूरव-आर्द्र विश्वेदेव कौन हैं?

पुरूरव-आर्द्र महालय श्राद्ध में आहूत किए जाने वाले विश्वेदेव हैं, जो पितृ-कर्म के रक्षक माने गए हैं।

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विश्वेदेव कौन हैं?

विश्वेदेव पितृ-कर्म के रक्षक, साक्षी और मार्गदर्शक देव हैं।

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पितृकर्म में आदित्यों की भूमिका क्या है?

आदित्य पितृकर्म में प्रपितामह के अधिष्ठाता हैं और ज्ञान, प्रकाश, आध्यात्मिक उन्नति तथा मोक्ष से जुड़े हैं।

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द्वादश आदित्य कौन हैं?

द्वादश आदित्य कश्यप और अदिति के 12 पुत्र हैं: इन्द्र, धाता, भग, पूषा, मित्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान, सविता, त्वष्टा, विष्णु और अंश।

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पितृकर्म में रुद्रों की भूमिका क्या है?

रुद्र पितृकर्म में पितामह के अधिष्ठाता हैं; वे सूक्ष्म पापों का दहन कर आत्मा को उच्च यात्रा के लिए शुद्ध करते हैं।

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रुद्र शब्द का अर्थ क्या है?

रुद्र का अर्थ है दुःख या पाप को दूर करने वाले, तथा संहार और प्राण-तत्त्व के अधिष्ठाता।

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एकादश रुद्र कौन हैं?

एकादश रुद्र ११ प्राणिक और संहार-शक्ति से जुड़े देव हैं: कपाली, पिंगल, भीम, विरूपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, शम्भु, चण्ड और भव।

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पितृकर्म में वसुओं की भूमिका क्या है?

वसु पितृकर्म में प्रथम पीढ़ी यानी पिता के अधिष्ठाता हैं और स्थूल शरीर, भौतिक तत्त्व व वंश-वृद्धि से जुड़े हैं।

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वसु शब्द का अर्थ क्या है?

वसु का अर्थ है निवास या आश्रय देने वाला; वसु भौतिक तत्त्वों और जगत के धारक देव हैं।

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अष्ट वसु कौन हैं?

अष्ट वसु हैं: आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास।

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श्राद्ध एवं पितृकर्म

श्राद्ध में अर्घ्य देने की विधि क्या है?

श्राद्ध में अर्घ्य (तर्पण) की विधि में दक्षिण मुख, अपसव्य स्थिति में, तांबे-चाँदी के पात्र में जल-तिल-कुश मिलाकर पितरों का नाम-गोत्र लेते हुए जल छोड़ा जाता है। अपराह्न का समय श्रेष्ठ माना गया है।

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