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विस्तृत उत्तर
पितृकर्म में वसुओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वसुओं को भौतिक शरीर, पार्थिव चेतना और प्रकृति के पञ्चमहाभूतों का प्रत्यक्ष धारक माना जाता है। देहत्याग के पश्चात जीव की प्रथम पारलौकिक परिणति और उसका स्थूल सानिध्य वसु रूप में ही होता है। श्राद्ध और तर्पण में प्रथम पीढ़ी, अर्थात पिता, को वसु स्वरूप मानकर तर्पण दिया जाता है। वसु रूप पिता तृप्त होने पर सुप्रजा, शारीरिक बल, ऐहिक सुख और वंश-वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
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