विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण और धर्मशास्त्रों में श्राद्ध में अर्घ्य देने की विस्तृत विधि वर्णित है। अर्घ्य का अर्थ है — पितरों को सादर जलांजलि अर्पित करना, जो तर्पण का ही एक अंग है।
अर्घ्य देने की प्रमुख विधि इस प्रकार है — दक्षिण दिशा की ओर मुख करें, क्योंकि दक्षिण दिशा पितरों की दिशा मानी जाती है। बाएँ घुटने को भूमि पर टिकाएँ। जनेऊ और गमछा दाएँ कंधे पर रखें (अपसव्य स्थिति)। तर्पण के लिए चाँदी, तांबे या पीतल के पात्र का उपयोग करें। स्टील के पात्र से तर्पण निषिद्ध है।
जल में तिल और कुश मिलाकर उसे पितरों के नाम और गोत्र उच्चारण करते हुए दक्षिण दिशा में छोड़ें। इस समय 'पितृगायत्री मंत्र' का पाठ किया जाता है।
तर्पण-अर्घ्य तीन पीढ़ियों के लिए किया जाता है — पिता, पितामह (दादा) और प्रपितामह (परदादा) और माता, मातामह (नाना) एवं मातुलेय (नानी) आदि के लिए। प्रत्येक के नाम पर अलग-अलग अर्घ्य दिया जाता है।
गरुड़ पुराण और धर्मग्रंथों के अनुसार श्राद्ध का उत्तम समय अपराह्न (दोपहर बाद) का है। इस समय किया गया तर्पण पितरों को अधिक तृप्ति देता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो परिजन शरीर छोड़ चुके हैं, वे चाहे किसी भी लोक में हों, श्रद्धापूर्वक अर्पित तर्पण से उन्हें तृप्ति प्राप्त होती है।
पितृपक्ष में प्रतिदिन तर्पण देना विशेष फलदायी है, परंतु व्यक्ति अपने पितर की मृत्युतिथि पर भी विशेष रूप से यह अर्घ्य दे सकता है।





