विस्तृत उत्तर
श्राद्ध में पंचबलि कर्म का विधान शास्त्रों में मिलता है, जिसमें गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी — पाँचों को भोजन देने का विधान है। इनमें से 'श्वानबलि' अर्थात कुत्ते को भोजन देने का विशेष महत्त्व है।
कुत्ते को यमराज का पशु माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यमराज के दो सेवक-कुत्ते हैं जिनके नाम 'श्याम' और 'शबल' हैं। ये दोनों यमलोक के मार्ग पर रहते हैं। शिव महापुराण के अनुसार कुत्ते को भोजन खिलाते समय यह वचन बोलना चाहिए — 'यमराज के मार्ग का अनुसरण करने वाले जो श्याम और शबल नाम के दो कुत्ते हैं, मैं उनके लिए यह अन्न का भाग देता हूँ। वे इस बलि को ग्रहण करें।'
इस विधान का तात्त्विक अर्थ यह है कि हमारे पितर किसी भी योनि में हो सकते हैं। यदि पितर यमलोक के मार्ग पर हैं तो वे श्याम और शबल जैसे कुत्तों के स्वरूप में उनके निकट होते हैं। इसलिए कुत्ते को भोजन देने से यमराज प्रसन्न होते हैं और वे पितरों के मार्ग को सुगम बना देते हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार श्राद्ध का भोजन ब्राह्मण को परोसने से पहले पंचबलि के अंतर्गत गाय, कौए और कुत्ते को भोजन देना चाहिए। यह परंपरा यह भी सिखाती है कि मनुष्य को केवल अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि पशु-पक्षी सहित समस्त जीवों के प्रति करुणा रखनी चाहिए।
इस भोजन को 'कुक्करबलि' कहा जाता है और यह पितृपक्ष में प्रतिदिन श्राद्ध के समय किया जाना उत्तम माना गया है।

