विस्तृत उत्तर
पितृपक्ष (भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या — 16 दिन) पितरों की सेवा का विशेष काल है। इसमें कुछ कार्य करने चाहिए और कुछ से बचना चाहिए।
क्या करना चाहिए
- 1श्राद्ध/तर्पण: मृत्यु तिथि अनुसार श्राद्ध और तिल-जल से तर्पण अवश्य करें।
- 2पिण्डदान: चावल, तिल, जौ के पिण्ड बनाकर दान।
- 3ब्राह्मण भोजन और दक्षिणा: विद्वान ब्राह्मण को भोजन कराएँ और दक्षिणा दें।
- 4दान: वस्त्र, अन्न, तिल, स्वर्ण, चाँदी, गाय आदि का दान।
- 5गौ सेवा: गाय को हरा चारा और रोटी खिलाएँ।
- 6कौवे को भोजन: कौवे को पितरों का दूत/वाहक माना गया है, अतः उन्हें भोजन का अंश दें।
- 7कुत्ते और चींटियों को भोजन: सनातन परम्परा में इनके लिए भी अंश निकालने का विधान।
- 8सात्विक आचरण: शुद्ध भोजन, सत्य बोलना, धैर्य रखना।
- 9पितरों का स्मरण और प्रार्थना।
क्या नहीं करना चाहिए
- 1शुभ कार्य वर्जित: विवाह, मुण्डन, गृहप्रवेश, नामकरण, नया व्यापार आरम्भ — ये सब पितृपक्ष में न करें।
- 2नई वस्तु न खरीदें: नया घर, वाहन, आभूषण, कपड़े (शुभ अवसर हेतु) न खरीदें।
- 3माँसाहार, मद्यपान वर्जित (आदर्श रूप में)।
- 4बाल न कटवाएँ, नाखून न काटें (कुछ परम्पराओं में)।
- 5लहसुन, प्याज, मसूर दाल से बचें (श्राद्ध भोजन में)।
- 6क्रोध और कलह से बचें।
- 7लोहे के बर्तन में श्राद्ध भोजन न बनाएँ।
ध्यान दें: कुछ नियमों में क्षेत्रीय और कुलाचार भेद होता है। मूल भावना है — पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान।





