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श्राद्ध-पितृ कर्म📜 गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, धर्मसिंधु1 मिनट पठन

पितृपक्ष में दान देने का शास्त्रीय विधान क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

पितृपक्ष दान: अन्न (सर्वश्रेष्ठ), वस्त्र, शय्या (बिस्तर), छाता, जूते, गोदान (सर्वोच्च), तिल, जलपूर्ण घड़ा। विधि: स्नान→दक्षिण मुख→संकल्प→दान+दक्षिणा। योग्य पात्र। पितृपक्ष दान = अनेकगुना फल।

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विस्तृत उत्तर

पितृपक्ष (महालया) में दान का विशेष शास्त्रीय विधान:

दान सामग्री

  1. 1अन्न दान (सर्वश्रेष्ठ): चावल, गेहूँ, दालें, तिल, जौ — ब्राह्मण/गरीबों को।
  2. 2वस्त्र दान: श्वेत वस्त्र, धोती, चादर।
  3. 3शय्या दान (बिस्तर): खाट/बिस्तर + चादर + तकिया = अत्यंत पुण्यदायी।
  4. 4छाता दान: 'छत्रदानात् सुखं लोके' — छाता = रक्षा प्रतीक।
  5. 5जूते/चप्पल दान: पितरों की यात्रा (यमलोक) सुगम हो।
  6. 6गोदान: सर्वोच्च — वैतरणी पार।
  7. 7तिल दान: पितृ तृप्ति हेतु अनिवार्य।
  8. 8जल दान (जलपूर्ण घड़ा): विशेष पुण्यदायी।

विधि: प्रातः स्नान → दक्षिण मुख → संकल्प ('पितृपक्षे दानं करिष्ये') → दान सामग्री ब्राह्मण/जरूरतमंद को → दक्षिणा → प्रणाम।

दान पात्र: शुद्ध आचरण वाला ब्राह्मण। गरीब, विधवा, अनाथ। 'पात्रे दानं महत्फलम्' — योग्य पात्र को दान = महा फल।

विशेष: पितृपक्ष में दिया गया दान सीधे पितरों तक पहुँचता है (मान्यता)। इस काल का दान सामान्य दान से अनेक गुना फलदायी।

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शास्त्रीय स्रोत
गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, धर्मसिंधु
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