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विस्तृत उत्तर
वसु' शब्द संस्कृत की 'वस्' धातु से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है निवास करना, आच्छादित करना या आश्रय देना। यास्काचार्य के अनुसार वसु वे देव हैं जिनमें समस्त चराचर जगत निवास करता है और जो भौतिक तत्त्वों के अधिष्ठाता हैं। वसु भौतिक शरीर, पार्थिव चेतना और प्रकृति के पञ्चमहाभूतों के धारक माने गए हैं। पितृकर्म में वसु अवस्था प्रथम और स्थूल पितृ स्तर का प्रतीक है, इसलिए पिता को वसु स्वरूप माना गया है।
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