विस्तृत उत्तर
अब तक के विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि भैरव साधना में 'नमः', 'ह्रीं', और 'क्लीं' का समावेश आकस्मिक नहीं है, बल्कि यह एक गहरे तांत्रिक और दार्शनिक सिद्धांत पर आधारित है। यह सिद्धांत भैरव और भैरवी की अद्वैतता का सिद्धांत है।
तांत्रिक दर्शन के अनुसार, भैरव (शिव) और भैरवी (शक्ति) अविभाज्य हैं। भैरव यदि परम चेतना हैं, तो भैरवी उनकी क्रियात्मक ऊर्जा है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं है।
यह 'विज्ञानाभैरव तंत्र' जैसे ग्रंथों के संवाद प्रारूप को दर्शाता है, जहाँ भैरवी (शक्ति) भैरव (चेतना) से ज्ञान की याचना करती है, जिससे साधकों के लिए ज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है।





