विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण, भागवत पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण और वायु पुराण जैसे महापुराणों में सभी लोकों की दूरियों का अत्यंत गणितीय विवरण योजन नामक प्राचीन वैदिक मापन इकाई में प्रस्तुत किया गया है। इन प्रामाणिक शास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार महर्लोक ब्रह्माण्ड के अचल बिंदु ध्रुवलोक से एक करोड़ योजन (1,00,00,000 योजन) ऊपर स्थित है। यह अकल्पनीय और विशाल दूरी इस तथ्य की प्रबल पुष्टि करती है कि महर्लोक भौतिक आकाश और इन्द्रिय-ग्राह्य सीमाओं की उन ऊँचाइयों पर है जहाँ तक न तो भौतिक वायुमण्डल का कोई प्रभाव है, न गुरुत्वाकर्षण का और न ही साधारण ग्रहीय गति का। ध्रुवलोक भगवान की इच्छा से स्थापित ब्रह्माण्ड का वह अचल और महान धुरी-बिन्दु है जिसके चारों ओर शिशुमार चक्र और समस्त ग्रह-नक्षत्र परिक्रमा करते हैं।
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