विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म की आध्यात्मिक संरचना का मूल आधार गुरु-शिष्य परंपरा है। यह केवल एक शैक्षणिक व्यवस्था नहीं, अपितु आध्यात्मिक प्रज्ञा (ज्ञान) को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अक्षुण्ण रूप में पहुंचाने का एक जीवंत, पवित्र एवं शाश्वत सोपान है।
इस परंपरा के केंद्र में 'गुरु' तत्व विद्यमान है, जिन्हें शास्त्र मात्र एक शिक्षक के रूप में नहीं, अपितु साक्षात ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समतुल्य मानता है।
गुरु शिष्य के अज्ञान रूपी अंधकार का नाश कर ज्ञान रूपी प्रकाश का सृजन करते हैं, उसकी आध्यात्मिक संभावनाओं का संरक्षण करते हैं और अंततः उसके अहंकार का रूपांतरण कर उसे शिवत्व में विलीन होने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
शास्त्रों ने गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना है, क्योंकि ईश्वर का साक्षात्कार कराने वाले पथ-प्रदर्शक स्वयं गुरु ही होते हैं।





