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विस्तृत उत्तर
धर्मशास्त्रों में पितृकुल से सात पीढ़ी तक सपिण्डता मानी गई है क्योंकि पिता की ओर से सात पीढ़ियों तक एक ही पिण्ड, वंश और रक्त संबंध का प्रभाव माना जाता है। याज्ञवल्क्य स्मृति और मनुस्मृति में “पंचमात् सप्तमादूर्ध्वमातृतः पितृतस्तथा” के आधार पर मातृकुल से पाँच और पितृकुल से सात पीढ़ियों की सीमा बताई गई है। इसी कारण पितृ तर्पण में सात पीढ़ियों का सिद्धांत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
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