विस्तृत उत्तर
रसातल में रहने का सुख अत्यंत श्रेष्ठ बताया गया है। रसातल के निवासी एक प्राचीन श्लोक का गान करते हैं, जिसे नारद जी ने मातलि को सुनाया था। उसमें कहा गया है कि न तो नागों के लोक में, न स्वर्ग में, न विमानों में और न ही त्रिविष्टप, अर्थात इंद्र के उच्चतम लोक, में निवास करने में वह सुख और आनंद है, जो रसातल में निवास करने में है। यह वर्णन रसातल के भौतिक सौंदर्य, शांति, ऐश्वर्य और आनंद को अत्यंत ऊँचा स्थान देता है। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि रसातल का केवल तामसिक या असुर-बहुल पक्ष ही नहीं, बल्कि सुरभि जैसी देवियों और फेनप जैसे तपोनिष्ठ ऋषियों से जुड़ा दिव्य और पवित्र पक्ष भी है।
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