विस्तृत उत्तर
सत्यलोक और शाश्वत वैकुण्ठ में जो मूलभूत अंतर है वह वैष्णव आचार्यों और श्रीमद्भागवत के अनुसार अत्यंत महत्वपूर्ण है। सत्यलोक भौतिक ब्रह्माण्ड के भीतर का सर्वोच्च लोक है। यद्यपि यह विशुद्ध सत्वगुण से निर्मित है तथापि यह प्रकृति के तीन गुणों की सीमा के भीतर है। महाप्रलय में यह नष्ट होता है। यहाँ के निवासी क्रम मुक्ति के अधिकारी हैं और उन्हें ब्रह्मज्ञान की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इसके विपरीत शाश्वत वैकुण्ठ प्रकृति के तीन गुणों और प्रलय से सर्वथा परे है। यह सत्यलोक से दो करोड़ बासठ लाख योजन ऊपर स्थित है। वैकुण्ठ में जो प्रवेश करता है वह कभी नहीं लौटता (गीता १५.६ — यद्गत्वा न निवर्तन्ते)। भागवत में 'ब्रह्मलोकः सनातनः' का तात्पर्य इसी शाश्वत वैकुण्ठ से है न कि भौतिक सत्यलोक से।
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