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शिव पूजा नियम📜 शिव पुराण, पद्म पुराण, धर्मशास्त्र2 मिनट पठन

शिव पूजा में शंख बजाना वर्जित क्यों माना जाता है?

संक्षिप्त उत्तर

शिव पुराण: शंखचूड़ दैत्य का शिव ने वध किया → उसकी अस्थियों से शंख उत्पन्न → दैत्य अवशेष से शिव पूजा अनुचित। शंख से जल और शंख बजाना दोनों वर्जित। तांबे/कांसे से जल चढ़ाएं। शंख = विष्णु प्रतीक, विष्णु पूजा में शुभ।

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विस्तृत उत्तर

शिव पूजा में शंख बजाना और शंख से जल चढ़ाना दोनों वर्जित हैं। इसके पीछे शिव पुराण में वर्णित पौराणिक कथा है:

पौराणिक कारण — शंखचूड़ वध

शिव पुराण के अनुसार शंखचूड़ (कुछ कथाओं में जालंधर का ही नाम) एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य था जो विष्णु भक्त था। उसके अत्याचारों से तंग होकर देवताओं ने भगवान शिव से सहायता मांगी। भगवान शिव ने शंखचूड़ का वध किया। मान्यता है कि शंखचूड़ की अस्थियों (हड्डियों) से शंख की उत्पत्ति हुई।

चूंकि शिव ने स्वयं शंखचूड़ का वध किया, अतः उस दैत्य के अवशेष (शंख) से शिव की पूजा करना अनुचित और अपमानजनक माना गया। इसलिए:

1. शंख से जल नहीं चढ़ाना चाहिए — तांबे/कांसे के लोटे से चढ़ाएं।

1शिव पूजा में शंख नहीं बजाना चाहिए।

3. शिव मंदिर में शंखनाद वर्जित (कुछ मंदिरों में)।

अन्य देवताओं में

शंख विष्णु भगवान का प्रतीक है — विष्णु, लक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं की पूजा में शंख का प्रयोग शुभ और विधिसम्मत है। केवल शिव पूजा में यह निषेध है।

अपवाद

कुछ क्षेत्रीय परंपराओं और मंदिरों में शिव पूजा में शंख बजाने की परंपरा भी मिलती है, विशेषतः दक्षिण भारत के कुछ शैव मंदिरों में। यह स्थानीय परंपरा है, सर्वमान्य विधान नहीं।

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शास्त्रीय स्रोत
शिव पुराण, पद्म पुराण, धर्मशास्त्र
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