विस्तृत उत्तर
शिव पूजा में शंख बजाना और शंख से जल चढ़ाना दोनों वर्जित हैं। इसके पीछे शिव पुराण में वर्णित पौराणिक कथा है:
पौराणिक कारण — शंखचूड़ वध
शिव पुराण के अनुसार शंखचूड़ (कुछ कथाओं में जालंधर का ही नाम) एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य था जो विष्णु भक्त था। उसके अत्याचारों से तंग होकर देवताओं ने भगवान शिव से सहायता मांगी। भगवान शिव ने शंखचूड़ का वध किया। मान्यता है कि शंखचूड़ की अस्थियों (हड्डियों) से शंख की उत्पत्ति हुई।
चूंकि शिव ने स्वयं शंखचूड़ का वध किया, अतः उस दैत्य के अवशेष (शंख) से शिव की पूजा करना अनुचित और अपमानजनक माना गया। इसलिए:
1. शंख से जल नहीं चढ़ाना चाहिए — तांबे/कांसे के लोटे से चढ़ाएं।
1शिव पूजा में शंख नहीं बजाना चाहिए।
3. शिव मंदिर में शंखनाद वर्जित (कुछ मंदिरों में)।
अन्य देवताओं में
शंख विष्णु भगवान का प्रतीक है — विष्णु, लक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं की पूजा में शंख का प्रयोग शुभ और विधिसम्मत है। केवल शिव पूजा में यह निषेध है।
अपवाद
कुछ क्षेत्रीय परंपराओं और मंदिरों में शिव पूजा में शंख बजाने की परंपरा भी मिलती है, विशेषतः दक्षिण भारत के कुछ शैव मंदिरों में। यह स्थानीय परंपरा है, सर्वमान्य विधान नहीं।





