विस्तृत उत्तर
यक्ष भुवर्लोक के निचले हिस्से में रहने वाली सूक्ष्म सत्ताएं हैं। श्रीमद्भागवत (५.२४.५) के अनुसार यक्ष उस 'विहाराजिरम्' अर्थात विचरण-क्षेत्र के निवासी हैं जहाँ राक्षस, पिशाच, भूत और प्रेत भी भटकते हैं। यक्ष मुख्य रूप से धन और प्रकृति के रक्षक होते हैं जो कुबेर के अनुचर माने जाते हैं। यद्यपि ये राक्षसों की तरह पूर्णतः क्रूर नहीं होते परंतु इनमें भौतिक आसक्ति प्रबल होती है। यही भौतिक आसक्ति उन्हें भुवर्लोक के निचले हिस्से में रखती है। इस प्रकार यक्षों का भुवर्लोक से संबंध उनकी भौतिक आसक्ति और धन-प्रकृति रक्षक स्वभाव के कारण है।
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