ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता · विश्वरूप दर्शन योग

श्लोक 25

विश्वरूप दर्शन योग · Vishwarupa Darshana Yoga

मूल पाठ

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि | दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक) मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल रही है। इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न होइये।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक) मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल रही है। इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न होइये।

English Meaning

Having seen Thy mouths fearful with teeth (blazing) like the fires of cosmic dissolution, I know not the four arters, nor do I find peace. Have mercy, O Lord of the gods, O abode of the universe.

Having seen Thy mouths fearful with teeth (blazing) like the fires of cosmic dissolution, I know not the four arters, nor do I find peace. Have mercy, O Lord of the gods, O abode of the universe.

आगे पढ़ें — विश्वरूप दर्शन योग के सभी श्लोक · श्रीमद्भगवद्गीता