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श्रीमद्भगवद्गीता · गुणत्रय विभाग योग

श्लोक 23

गुणत्रय विभाग योग · Gunatraya Vibhaga Yoga

मूल पाठ

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते | गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो उदासीनकी तरह स्थित है और जो गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही (गुणोंमें) बरत रहे हैं -- इस भावसे जो अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो उदासीनकी तरह स्थित है और जो गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता तथा गुण ही (गुणोंमें) बरत रहे हैं -- इस भावसे जो अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है और स्वयं कोई भी चेष्टा नहीं करता।

English Meaning

He who, seated like one unconcerned, is not moved by the qualities, and who, knowing that the qualities are active, is self-centred and moves not.

He who, seated like one unconcerned, is not moved by the qualities, and who, knowing that the qualities are active, is self-centred and moves not.

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