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श्रीमद्भगवद्गीता · गुणत्रय विभाग योग

श्लोक 26

गुणत्रय विभाग योग · Gunatraya Vibhaga Yoga

मूल पाठ

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते | स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

English Meaning

And he who serves Me with unswerving devotion, he, crossing beyond the qualities, is fit for becoming Brahman.

And he who serves Me with unswerving devotion, he, crossing beyond the qualities, is fit for becoming Brahman.

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