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श्रीमद्भगवद्गीता · गुणत्रय विभाग योग

श्लोक 27

गुणत्रय विभाग योग · Gunatraya Vibhaga Yoga

मूल पाठ

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च | शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

क्योंकि ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

क्योंकि ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ।

English Meaning

For I am the abode of Brahman, the immortal and the immutable, of everlasting Dharma and of absolute bliss.

For I am the abode of Brahman, the immortal and the immutable, of everlasting Dharma and of absolute bliss.

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