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श्रीमद्भगवद्गीता · पुरुषोत्तम योग

श्लोक 11

पुरुषोत्तम योग · Purushottama Yoga

मूल पाठ

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् | यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

यत्न करनेवाले योगीलोग अपने-आपमें स्थित इस परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। परन्तु जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अविवेकी मनुष्य यत्न करनेपर भी इस तत्त्वका अनुभव नहीं करते।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

यत्न करनेवाले योगीलोग अपने-आपमें स्थित इस परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। परन्तु जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अविवेकी मनुष्य यत्न करनेपर भी इस तत्त्वका अनुभव नहीं करते।

English Meaning

The Yogins striving (for perfection) behold Him dwelling in the Self; but, the unrefined and unintelligent, even though striving, see Him not.

The Yogins striving (for perfection) behold Him dwelling in the Self; but, the unrefined and unintelligent, even though striving, see Him not.

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