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श्रीमद्भगवद्गीता · पुरुषोत्तम योग

श्लोक 10

पुरुषोत्तम योग · Purushottama Yoga

मूल पाठ

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् | विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले ज्ञानी मनुष्य ही जानते हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

शरीरको छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीरमें स्थित हुए अथवा विषयोंको भोगते हुए भी गुणोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपको मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले ज्ञानी मनुष्य ही जानते हैं।

English Meaning

The deluded do not see Him Who departs, stays and enjoys; but they who possess the eye of knowledge behold Him.

The deluded do not see Him Who departs, stays and enjoys; but they who possess the eye of knowledge behold Him.

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