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श्रीमद्भगवद्गीता · पुरुषोत्तम योग

श्लोक 9

पुरुषोत्तम योग · Purushottama Yoga

मूल पाठ

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च | अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

यह जीवात्मा मनका आश्रय लेकर श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, रसना और घ्राण -- इन पाँचों इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता है।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

यह जीवात्मा मनका आश्रय लेकर श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, रसना और घ्राण -- इन पाँचों इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता है।

English Meaning

Presiding over the ear, the eye, touch, taste and smell, as well as the mind, it enjoys the objects of the senses.

Presiding over the ear, the eye, touch, taste and smell, as well as the mind, it enjoys the objects of the senses.

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