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श्रीमद्भगवद्गीता · श्रद्धात्रय विभाग योग

श्लोक 5

श्रद्धात्रय विभाग योग · Shraddhatraya Vibhaga Yoga

मूल पाठ

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः | दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ।

English Meaning

Those men who practise terrific austerities not enjoined by the scriptures, given to hypocrisy and egoism, impelled by the force of lust and attachment.

Those men who practise terrific austerities not enjoined by the scriptures, given to hypocrisy and egoism, impelled by the force of lust and attachment.

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