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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 3

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः | यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्य-कर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप-रूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

श्रीभगवान् बोले -- कई विद्वान् काम्य-कर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप-रूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।

English Meaning

Some philosophers declare that actions should be abandoned as an evil; while others (declare) that acts of sacrifice, gift and austerity should not be relinished.

Some philosophers declare that actions should be abandoned as an evil; while others (declare) that acts of sacrifice, gift and austerity should not be relinished.

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