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श्रीमद्भगवद्गीता · मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 5

मोक्ष संन्यास योग · Moksha Sanyasa Yoga

मूल पाठ

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् | यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।

English Meaning

Acts of sacrifice, gift and austerity should not be abandoned, but should be performed; sacrifice, gift and also austerity are the purifiers of the wise.

Acts of sacrifice, gift and austerity should not be abandoned, but should be performed; sacrifice, gift and also austerity are the purifiers of the wise.

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