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श्रीमद्भगवद्गीता · कर्म योग

श्लोक 9

कर्म योग · Karma Yoga

मूल पाठ

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः | तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

यज्ञ (कर्तव्यपालन) के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र (अपने लिये किये जानेवाले) कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्य-समुदाय कर्मोंसे बँधता है, इसलिये हे कुन्तीनन्दन! तू आसक्ति-रहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्य-कर्म कर।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

यज्ञ (कर्तव्यपालन) के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र (अपने लिये किये जानेवाले) कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्य-समुदाय कर्मोंसे बँधता है, इसलिये हे कुन्तीनन्दन! तू आसक्ति-रहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्य-कर्म कर।

English Meaning

The world is bound by actions other than those performed for the sake of sacrifice; do thou, therefore, O son of Kunti (Arjuna), perform action for that sake (for sacrifice alone), free from attachment.

The world is bound by actions other than those performed for the sake of sacrifice; do thou, therefore, O son of Kunti (Arjuna), perform action for that sake (for sacrifice alone), free from attachment.

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