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श्रीमद्भगवद्गीता · ज्ञान कर्म संन्यास योग

श्लोक 20

ज्ञान कर्म संन्यास योग · Jnana Karma Sanyasa Yoga

मूल पाठ

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः | कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है, वह कर्मोंमें अच्छी तरह लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता।

English Meaning

Having abandoned attachment to the fruits of the action, ever content, depending on nothing, he does not do anything though engaged in activity.

Having abandoned attachment to the fruits of the action, ever content, depending on nothing, he does not do anything though engaged in activity.

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