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श्रीमद्भगवद्गीता · ज्ञान कर्म संन्यास योग

श्लोक 21

ज्ञान कर्म संन्यास योग · Jnana Karma Sanyasa Yoga

मूल पाठ

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः | शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित कर्मयोगी केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापको प्राप्त नहीं होता।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित कर्मयोगी केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापको प्राप्त नहीं होता।

English Meaning

Without hope and with the mind and the self controlled, having abandoned all covetousness, doing mere bodily action, he incurs no sin.

Without hope and with the mind and the self controlled, having abandoned all covetousness, doing mere bodily action, he incurs no sin.

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