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श्रीमद्भगवद्गीता · आत्म संयम योग

श्लोक 22

आत्म संयम योग · Atma Samyama Yoga

मूल पाठ

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः | यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता।

English Meaning

Which, having obtained, he thinks there is no other gain superior to it; wherein estabished, he is not moved even by heavy sorrow.

Which, having obtained, he thinks there is no other gain superior to it; wherein estabished, he is not moved even by heavy sorrow.

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