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श्रीमद्भगवद्गीता · आत्म संयम योग

श्लोक 32

आत्म संयम योग · Atma Samyama Yoga

मूल पाठ

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन | सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे अर्जुन! जो (ध्यानयुक्त ज्ञानी महापुरुष) अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है, वह परम योगी माना गया है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

हे अर्जुन! जो (ध्यानयुक्त ज्ञानी महापुरुष) अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है, वह परम योगी माना गया है।

English Meaning

He who, through the likeness of the Self, O Arjuna, sees equality everywhere, be it pleasure or pain, he is regarded as the highest Yogi.

He who, through the likeness of the Self, O Arjuna, sees equality everywhere, be it pleasure or pain, he is regarded as the highest Yogi.

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