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श्रीमद्भगवद्गीता · राजविद्या राजगुह्य योग

श्लोक 12

राजविद्या राजगुह्य योग · Rajavidya Rajaguhya Yoga

मूल पाठ

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः | राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ-कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान सत्-फल देनेवाले नहीं होते, ऐसे अविवेकी मनुष्य आसुरी, राक्षसी और मोहिनी फकृतिका आश्रय लेते हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ-कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान सत्-फल देनेवाले नहीं होते, ऐसे अविवेकी मनुष्य आसुरी, राक्षसी और मोहिनी फकृतिका आश्रय लेते हैं।

English Meaning

Of vain hopes, of vain actions, of vain knowledge and senseless, they verily are possessed of the deceitful nature of demons and undivine beings.

Of vain hopes, of vain actions, of vain knowledge and senseless, they verily are possessed of the deceitful nature of demons and undivine beings.

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