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श्रीमद्भगवद्गीता · राजविद्या राजगुह्य योग

श्लोक 30

राजविद्या राजगुह्य योग · Rajavidya Rajaguhya Yoga

मूल पाठ

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् | साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है।

English Meaning

Even if the most sinful worships Me, with devotion to none else, he too should indeed by regarded as righteous for he has rightly resolved.

Even if the most sinful worships Me, with devotion to none else, he too should indeed by regarded as righteous for he has rightly resolved.

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