मातृका देवी / वर्णेश्वरी (मणिपूर चक्र की पंखुड़ियाँ) बीज बीज मंत्र
डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं
व्यक्तिगत शक्ति, आत्मविश्वास और पाचन अग्नि (Digestive fire) का ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ एकीकरण 3।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
व्यक्तिगत शक्ति, आत्मविश्वास और पाचन अग्नि (Digestive fire) का ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ एकीकरण 3।
इस मंत्र से क्या होगा?
व्यक्तिगत शक्ति, आत्मविश्वास और पाचन अग्नि (Digestive fire) का ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ एकीकरण
जाप विधि
नाभि चक्र की दस पंखुड़ियों पर ध्यान लगाते हुए जप 2।
विशेष टिप्पणियाँ
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अच्युतानन्त गोविन्द नामोच्चारणभेषजात्। नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥
shanti mantraॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवागँसस्तनूभिः । व्यशेम देवहितं यदायूः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
dhyan mantraवसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
mool mantraॐ ऐं सरस्वत्यै नमः
vaidik mantraॐ अग्ने विवस्वदा भरास्मभ्यमूतये महे । देवो हासि नो दृशे ॥
stotra mantraदेवासुर मनुष्याश्च सिद्ध विद्या धरोरगाः त्वया विलोकिताः सर्वे नाश यान्ति समूलतः। प्रसाद कुरु मे सौरे वरदो भव भास्करे एवं स्तुतस्तदा ग्रह राजो महाबलः। 47