पारंपरिक शांति पाठ (पुराण परंपरा) शांति मंत्र
ॐ सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु । सर्वेषां शान्तिर्भवतु । सर्वेषां पूर्णं भवतु । सर्वेषां मङ्गलं भवतु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इस शांति मंत्र का सर्वोच्च प्रयोजन मन की पूर्ण शांति, चारों ओर के वातावरण में संतुलन, और नकारात्मक विचारों का पूर्णतः शमन करना है 11। यह मंत्र विशेष रूप से तब उपयोग किया जाता है जब व्यक्ति अपने आस-पास
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस शांति मंत्र का सर्वोच्च प्रयोजन मन की पूर्ण शांति, चारों ओर के वातावरण में संतुलन, और नकारात्मक विचारों का पूर्णतः शमन करना है 11। यह मंत्र विशेष रूप से तब उपयोग किया जाता है जब व्यक्ति अपने आस-पास के वातावरण में कलह, अशांति या विघ्नों का अनुभव कर रहा हो। यह साधक की मानसिक अवस्था को चिंता और भय से मुक्त कर उसे पूर्णता (fulfillment) और कल्याण (auspiciousness) की भावना से भर देता है 11। इसके जप से उत्पन्न प्रकम्पन तंत्रिका तंत्र (nervous system) को शिथिल करते हैं और आधिभौतिक तथा आधिदैविक तापों को शांत कर एक ऐसे शांतिपूर्ण वायुमंडल की स्थापना करते हैं जहां ध्यान और आध्यात्मिक साधना स्वतः ही फलित होने लगती है 9।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस शांति मंत्र का सर्वोच्च प्रयोजन मन की पूर्ण शांति, चारों ओर के वातावरण में संतुलन, और नकारात्मक विचारों का पूर्णतः शमन करना है 11
यह मंत्र विशेष रूप से तब उपयोग किया जाता है जब व्यक्ति अपने आस-पास के वातावरण में कलह, अशांति या विघ्नों का अनुभव कर रहा हो
यह साधक की मानसिक अवस्था को चिंता और भय से मुक्त कर उसे पूर्णता (fulfillment) और कल्याण (auspiciousness) की भावना से भर देता है 11
इसके जप से उत्पन्न प्रकम्पन तंत्रिका तंत्र (nervous system) को शिथिल करते हैं और आधिभौतिक तथा आधिदैविक तापों को शांत कर एक ऐसे शांतिपूर्ण वायुमंडल की स्थापना करते हैं जहां ध्यान और आध्यात्मिक साधना स्वतः ही फलित होने लगती है
जाप विधि
इस सार्वभौमिक शांति पाठ का जप किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, सामूहिक ध्यान, सत्संग या दैनिक पूजा के समापन पर अनिवार्य रूप से किया जाता है 11। इसे सुखासन या पद्मासन में बैठकर, हाथों को ध्यान मुद्रा में घुटनों पर रखकर, अत्यंत शांत और स्थिर स्वर में जपा जाना चाहिए। उच्चारण के समय मन में यह भाव (visualization) रखना चाहिए कि मंत्र से उत्पन्न होने वाली ध्वन्यात्मक ऊर्जा तरंगें साधक के हृदय चक्र से निकलकर दसों दिशाओं में फैल रही हैं 11। यदि वातावरण में भारीपन या नकारात्मकता का आभास हो, तो इस मंत्र को १०८ बार जपकर पूरे स्थान पर जल का सिंचन करने का भी पारंपरिक विधान है 5।
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