पारंपरिक शांति स्तुति (पुराण परंपरा) शांति मंत्र
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः । सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु । मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इस पारंपरिक स्तुति का मूल प्रयोजन साधक के भीतर से स्वार्थ, संकीर्णता और अहंकार को मिटाकर सार्वभौमिक करुणा (universal compassion) और असीम मानसिक शांति का विस्तार करना है 15। जब मनुष्य केवल अपने दुखों प
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस पारंपरिक स्तुति का मूल प्रयोजन साधक के भीतर से स्वार्थ, संकीर्णता और अहंकार को मिटाकर सार्वभौमिक करुणा (universal compassion) और असीम मानसिक शांति का विस्तार करना है 15। जब मनुष्य केवल अपने दुखों पर केंद्रित होता है, तो उसका मानसिक तनाव बढ़ता है; यह मंत्र चेतना को 'स्व' से 'सर्व' की ओर ले जाकर अवसाद, ईर्ष्या और कुंठा जैसी नकारात्मक वृत्तियों को शांत करता है 3। इसका उद्देश्य संपूर्ण विश्व के प्राणियों के लिए सुख, आरोग्य और कष्ट-मुक्ति की कामना करना है, जो पलटकर साधक के स्वयं के आंतरिक और बाह्य वातावरण को शुद्ध और शांत कर देता है 29। यह आधिभौतिक तापों (संसार के अन्य जीवों से होने वाले कष्ट) को समूल नष्ट कर एक अत्यंत सौहार्दपूर्ण, सुरक्षित और सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र (positive energy field) का निर्माण करता है 9।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस पारंपरिक स्तुति का मूल प्रयोजन साधक के भीतर से स्वार्थ, संकीर्णता और अहंकार को मिटाकर सार्वभौमिक करुणा (universal compassion) और असीम मानसिक शांति का विस्तार करना है 15
जब मनुष्य केवल अपने दुखों पर केंद्रित होता है, तो उसका मानसिक तनाव बढ़ता है
यह मंत्र चेतना को 'स्व' से 'सर्व' की ओर ले जाकर अवसाद, ईर्ष्या और कुंठा जैसी नकारात्मक वृत्तियों को शांत करता है 3
इसका उद्देश्य संपूर्ण विश्व के प्राणियों के लिए सुख, आरोग्य और कष्ट-मुक्ति की कामना करना है, जो पलटकर साधक के स्वयं के आंतरिक और बाह्य वातावरण को शुद्ध और शांत कर देता है 29
जाप विधि
पुराण और पारम्परिक सनातन व्यवस्था से निकले इस अत्यंत लोकप्रिय शांति मंत्र का जप प्रतिदिन की प्रार्थना के समापन पर, योग व ध्यान सत्र के अंत में, या किसी भी शुभ अनुष्ठान के विसर्जन के समय किया जाता है 15। साधक को दोनों हाथ वक्षस्थल के पास अंजलि मुद्रा (प्रणाम की मुद्रा) में रखकर, नेत्रों को कोमलता से बंद कर, संपूर्ण विश्व के मानचित्र या ब्रह्मांड का मानसिक ध्यान करते हुए इसका उच्चारण करना चाहिए 29। स्वर में करुणा, वात्सल्य और प्रेम का भाव अत्यंत आवश्यक है। मानसिक तनाव या वैश्विक अशांति के समय इसे रुद्राक्ष या तुलसी की माला पर १०८ बार जपने से साधक की व्यक्तिगत चेतना का विस्तार होता है 5।
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