ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
उद्देश्य अनुसार मंत्र
छान्दोग्य एवं केन उपनिषद (सामवेद शांति पाठ)

छान्दोग्य एवं केन उपनिषद (सामवेद शांति पाठ) शांति मंत्र

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मे अस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

इस मंत्र का प्राथमिक प्रयोजन शारीरिक अंगों, प्राण ऊर्जा, और इंद्रियों की चंचलता को शांत कर उन्हें आध्यात्मिक बल और स्थिरता प्रदान करना है 12। ध्यान या साधना के दौरान अक्सर शारीरिक व्याधियां या इंद्रिय

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारशांति मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

इस मंत्र का प्राथमिक प्रयोजन शारीरिक अंगों, प्राण ऊर्जा, और इंद्रियों की चंचलता को शांत कर उन्हें आध्यात्मिक बल और स्थिरता प्रदान करना है 12। ध्यान या साधना के दौरान अक्सर शारीरिक व्याधियां या इंद्रियों की बहिर्मुखता (distractions) अशांति का कारण बनती हैं; यह मंत्र उन सभी दैहिक (आध्यात्मिक) तापों को नष्ट कर शरीर को एक शांत और सुदृढ़ माध्यम में परिवर्तित करता है 9। इसका उद्देश्य स्नायुतंत्र (nervous system) की उत्तेजना को कम करना, मानसिक भटकाव को रोकना, और साधक के भीतर यह अटूट विश्वास और शांति स्थापित करना है कि वह ब्रह्मांडीय सत्ता से पृथक नहीं है 12। अंततः यह मंत्र संपूर्ण मनोदैहिक प्रणाली (psychosomatic system) में एक असीम विश्राम और अगाध ध्यान-मग्न अवस्था का निर्माण करता है 9।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

इस मंत्र का प्राथमिक प्रयोजन शारीरिक अंगों, प्राण ऊर्जा, और इंद्रियों की चंचलता को शांत कर उन्हें आध्यात्मिक बल और स्थिरता प्रदान करना है 12

02

ध्यान या साधना के दौरान अक्सर शारीरिक व्याधियां या इंद्रियों की बहिर्मुखता (distractions) अशांति का कारण बनती हैं

03

यह मंत्र उन सभी दैहिक (आध्यात्मिक) तापों को नष्ट कर शरीर को एक शांत और सुदृढ़ माध्यम में परिवर्तित करता है 9

04

इसका उद्देश्य स्नायुतंत्र (nervous system) की उत्तेजना को कम करना, मानसिक भटकाव को रोकना, और साधक के भीतर यह अटूट विश्वास और शांति स्थापित करना है कि वह ब्रह्मांडीय सत्ता से पृथक नहीं है 12

जाप विधि

सामवेदीय परंपरा के इस शांति मंत्र का जप उपनिषदों के गंभीर पाठ के आरंभ में अथवा योग और ध्यान के लंबे अभ्यासों से पूर्व शरीर और इंद्रियों को स्थिर करने के लिए किया जाता है 12। जपकर्ता को पद्मासन या वज्रासन में बैठकर पूरे शरीर को शिथिल (relax) छोड़ देना चाहिए। गहरी श्वास लेते हुए और छोड़ते हुए, शरीर के प्रत्येक अंग (विशेषकर वाणी, प्राण, चक्षु, श्रोत्र) में ऊर्जा के प्रवाह का मानसिक अवलोकन (body scan) करना चाहिए 12। मंत्र का उच्चारण सामवेद की संगीतमय और मधुर लय के साथ करना सर्वोत्तम माना जाता है। शारीरिक थकान या मानसिक व्याकुलता होने पर इसे एकांत में ११ या २१ बार जपने का विधान है, और प्रत्येक 'शांति' के उच्चारण के साथ शरीर के रोम-रोम में शांति का संचार महसूस करना चाहिए 7।

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