ईशावास्य उपनिषद एवं बृहदारण्यक उपनिषद शांति मंत्र
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इस शांति पाठ का विशिष्ट प्रयोजन मानव मन में व्याप्त अभाव, अपूर्णता और हीन भावना (scarcity mindset) से उत्पन्न होने वाले तनाव और असंतोष को पूर्णतः नष्ट करना है 16। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में उत्पन्न हो
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस शांति पाठ का विशिष्ट प्रयोजन मानव मन में व्याप्त अभाव, अपूर्णता और हीन भावना (scarcity mindset) से उत्पन्न होने वाले तनाव और असंतोष को पूर्णतः नष्ट करना है 16। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में उत्पन्न होने वाली मानसिक रिक्तता और असंतुलन को शांत कर, यह मंत्र साधक को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ एकीकरण का अनुभव कराता है 15। इसका उपयोग मन को यह बोध कराने के लिए किया जाता है कि संपूर्ण सृष्टि पूर्ण और शांत है, और वही पूर्णता साधक के भीतर भी विद्यमान है। फलस्वरूप, यह दैहिक, दैविक और भौतिक—इन तीनों तापों से उत्पन्न होने वाली उद्विग्नता को शांत कर अगाध मानसिक विश्राम, आत्म-संतुष्टि और तनाव-मुक्ति (stress relief) प्रदान करता है 9।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस शांति पाठ का विशिष्ट प्रयोजन मानव मन में व्याप्त अभाव, अपूर्णता और हीन भावना (scarcity mindset) से उत्पन्न होने वाले तनाव और असंतोष को पूर्णतः नष्ट करना है 16
आधुनिक जीवन की भागदौड़ में उत्पन्न होने वाली मानसिक रिक्तता और असंतुलन को शांत कर, यह मंत्र साधक को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ एकीकरण का अनुभव कराता है 15
इसका उपयोग मन को यह बोध कराने के लिए किया जाता है कि संपूर्ण सृष्टि पूर्ण और शांत है, और वही पूर्णता साधक के भीतर भी विद्यमान है
फलस्वरूप, यह दैहिक, दैविक और भौतिक—इन तीनों तापों से उत्पन्न होने वाली उद्विग्नता को शांत कर अगाध मानसिक विश्राम, आत्म-संतुष्टि और तनाव-मुक्ति (stress relief) प्रदान करता है
जाप विधि
शुक्ल यजुर्वेद की परंपरा के इस अद्वैत शांति मंत्र का जप किसी भी आध्यात्मिक अनुष्ठान, उपनिषद पाठ या गंभीर ध्यान-साधना के आरंभ और समापन पर किया जाता है 15। इस मंत्र को एकांत स्थान पर, शांत मन से सुखासन में बैठकर जपना चाहिए। दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाकर या अंजलि मुद्रा में वक्षस्थल के समीप रखते हुए, श्वास को नाभि तक गहरा खींचें। मंत्र के प्रत्येक शब्द के उच्चारण के साथ ब्रह्मांड की पूर्णता का चिंतन करें। तनाव या मानसिक विक्षोभ की स्थिति में इसे लगातार २१ या १०८ बार रुद्राक्ष या स्फटिक की माला से जपना अत्यंत फलदायी है 5। अंतिम तीन 'शांति' का उच्चारण अत्यंत मंद और दीर्घ होना चाहिए, जिससे ध्वनि का प्रकम्पन सीधे मस्तिष्क की तरंगों को शांत कर सके 7।
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