गणपति एवं साईं गोरखनाथ (विघ्न निवारण सबदी) शाबर मंत्र
ओम नमो आदेश गुरु जी को आदेश पहला गण गणपति 14 विद्या सारथी जति सती कैलाशपति बल भीम मारुती आले विघ्न निवारी साईं गोरखनाथ की दुआही गुरु की शक्ति मेरी भक्ति चले मंत्र ईश्वरी वाचा पिंड कच्चा गुरु गोरखनाथ का शब्द सच्चा 24
इसका मुख्य प्रयोजन किसी भी तांत्रिक प्रयोग, भौतिक कार्य या लंबी यात्रा में आने वाले अप्रत्याशित और भयंकर विघ्नों (आले विघ्न) का समूल निवारण करना है 24। यह मंत्र ब्रह्मांड की उन समस्त रक्षक शक्तियों का
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इसका मुख्य प्रयोजन किसी भी तांत्रिक प्रयोग, भौतिक कार्य या लंबी यात्रा में आने वाले अप्रत्याशित और भयंकर विघ्नों (आले विघ्न) का समूल निवारण करना है 24। यह मंत्र ब्रह्मांड की उन समस्त रक्षक शक्तियों का एक साथ आवाहन करता है जो कार्य-सिद्धि के लिए उत्तरदायी हैं—जैसे प्रथम पूज्य गणपति (जो 14 विद्याओं के सारथी हैं), भगवान शिव (कैलाशपति), और असीमित बलशाली हनुमान (बल भीम मारुती)। यह दर्शन स्थापित करता है कि भौतिक शरीर (पिंड) तो नाशवान (कच्चा) है, परंतु गुरु गोरखनाथ का नाद (शब्द) शाश्वत और सच्चा है। इस शाश्वत नाद की गूंज से साधक के मार्ग की हर प्रकार की अतीन्द्रिय और भौतिक बाधाएं स्वतः हट जाती हैं और कार्य निर्विघ्न पूर्ण होता है 24।
इस मंत्र से क्या होगा?
इसका मुख्य प्रयोजन किसी भी तांत्रिक प्रयोग, भौतिक कार्य या लंबी यात्रा में आने वाले अप्रत्याशित और भयंकर विघ्नों (आले विघ्न) का समूल निवारण करना है 24
यह मंत्र ब्रह्मांड की उन समस्त रक्षक शक्तियों का एक साथ आवाहन करता है जो कार्य-सिद्धि के लिए उत्तरदायी हैं—जैसे प्रथम पूज्य गणपति (जो 14 विद्याओं के सारथी हैं), भगवान शिव (कैलाशपति), और असीमित बलशाली हनुमान (बल भीम मारुती)
यह दर्शन स्थापित करता है कि भौतिक शरीर (पिंड) तो नाशवान (कच्चा) है, परंतु गुरु गोरखनाथ का नाद (शब्द) शाश्वत और सच्चा है
इस शाश्वत नाद की गूंज से साधक के मार्ग की हर प्रकार की अतीन्द्रिय और भौतिक बाधाएं स्वतः हट जाती हैं और कार्य निर्विघ्न पूर्ण होता है
जाप विधि
यह नाथ परंपरा की अत्यंत पवित्र 'सबदी' (गोरखवाणी) है, जिसे किसी भी बड़े अनुष्ठान या तांत्रिक साधना को प्रारंभ करने से पूर्व एक 'प्रारंभिक कुंजी' (Opening Key) के रूप में जपा जाता है 24। साधक को स्नान कर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। सर्वप्रथम अपने इष्ट और गुरु को आदेश (प्रणाम) करते हुए इस मंत्र का 11 या 21 बार सुरीले और स्पष्ट स्वर में उच्चारण करना चाहिए। यह मंत्र स्वयं में इतना चैतन्य है कि इसके लिए किसी कठोर आसन, विशिष्ट माला या जटिल कर्मकांड की बाध्यता नहीं है; इसे पूर्ण मानसिक समर्पण के साथ केवल वाचिक रूप से भी सिद्ध किया जा सकता है 24।
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विशोका वा ज्योतिष्मती
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