महाकाली अघोर मारण एवं उच्चाटन शाबर मंत्र
ॐ नमो आदेश गुरु का आदेश काली काली महाकाली इन्द्र की बेटी ब्रम्हा की साली चाम की गठरी हाड़ की माला भजो आनन्द सुंदरी बाला। भरपूर वसन करले उठाई काम क्रन्ति कलिका आई लुच्ची मोहन भोग भेट कड़ाही जहा भेजा वहा जाई कष्ट दुखो से लेव बचाई सभी देत्यन को मार भगाई आदि अंत तू रही सहाई में पूत तू मेरी माई सब दुखन से लेव बचाई गुरु की शक्ति हमारी भक्ति फुरे मंत्र दोहाई काली की ईश्वरो वाचा 12
इस अघोर साधना का प्रयोजन उन घोर शत्रुओं का समूल नाश और उच्चाटन (जड़ से उखाड़ फेंकना) करना है जो साधक के जीवन में असहनीय कष्ट, भय और दुख उत्पन्न कर रहे हों 12। मंत्र में प्रयुक्त शब्दावली 'जहाँ भेजा वह
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस अघोर साधना का प्रयोजन उन घोर शत्रुओं का समूल नाश और उच्चाटन (जड़ से उखाड़ फेंकना) करना है जो साधक के जीवन में असहनीय कष्ट, भय और दुख उत्पन्न कर रहे हों 12। मंत्र में प्रयुक्त शब्दावली 'जहाँ भेजा वहां जाई' का तांत्रिक तात्पर्य यह है कि इस अनुष्ठान के द्वारा जाग्रत की गई महाकाली की संहारक ऊर्जा को ब्रह्मांड में किसी भी स्थान पर बैठे शत्रु को नष्ट करने के लिए एक निर्देशित अस्त्र (Guided Missile) की भांति भेजा जा सकता है 12। यह मंत्र दैत्यों (शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों) को मार भगाता है और साथ ही साधक को एक पुत्र की भांति सुरक्षा प्रदान करता है (में पूत तू मेरी माई)। यह मारण के साथ-साथ साधक के लिए अत्यंत शक्तिशाली आत्म-रक्षा का अस्त्र भी है 12।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस अघोर साधना का प्रयोजन उन घोर शत्रुओं का समूल नाश और उच्चाटन (जड़ से उखाड़ फेंकना) करना है जो साधक के जीवन में असहनीय कष्ट, भय और दुख उत्पन्न कर रहे हों 12
मंत्र में प्रयुक्त शब्दावली 'जहाँ भेजा वहां जाई' का तांत्रिक तात्पर्य यह है कि इस अनुष्ठान के द्वारा जाग्रत की गई महाकाली की संहारक ऊर्जा को ब्रह्मांड में किसी भी स्थान पर बैठे शत्रु को नष्ट करने के लिए एक निर्देशित अस्त्र (Guided Missile) की भांति भेजा जा सकता है 12
यह मंत्र दैत्यों (शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों) को मार भगाता है और साथ ही साधक को एक पुत्र की भांति सुरक्षा प्रदान करता है (में पूत तू मेरी माई)
यह मारण के साथ-साथ साधक के लिए अत्यंत शक्तिशाली आत्म-रक्षा का अस्त्र भी है
जाप विधि
महाकाली के इस महा-उग्र और दीर्घकालिक शाबर मंत्र की साधना निरंतर 45 दिनों तक चलती है 12। साधक को एक नए, अछूते और पूर्णतः शुद्ध एकांत स्थान का चयन कर, शत्रु का एक नया चित्र अपने समक्ष स्थापित करना होता है। रात्रि के समय काले आसन पर बैठकर, पूर्ण एकाग्रता के साथ इस मंत्र का नित्य 5 माला (रुद्राक्ष अथवा काले हकीक की माला पर) जप करना अनिवार्य है 12। अनुष्ठान के दौरान तामसिक और सात्विक ऊर्जाओं का अत्यधिक दबाव बनता है, अतः साधक का मानसिक संतुलन अत्यंत सुदृढ़ होना चाहिए; किंचित मात्र भी त्रुटि विनाशकारी हो सकती है। 45 दिन की साधना निर्विघ्न पूर्ण होने पर, कार्य-सिद्धि के उपरांत साधक को किसी श्मशान घाट या काली के अत्यंत जाग्रत उग्र पीठ (मंदिर) पर जाकर माता को बकरे की कलेजी (Liver) का बलि-भोग अर्पित करना अनिवार्य होता है 12। अनुष्ठान के घटक तांत्रिक आवश्यकता अवधि एवं जप संख्या 45 दिन निरंतर, नित्य 5 माला 12 सामग्री एवं आसन शत्रु का चित्र, काला आसन, रुद्राक्ष/हकीक माला 12 सिद्धि उपरांत बलि-भोग बकरे की कलेजी (श्मशान या उग्र पीठ में अर्पित) 12
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kavach mantraॐ भूर्भुव: स्व: प्रांचामा पातु भूतेशः अग्ने पातु शंकर दक्षिणे पातुमा रुद्रो नैऋत्य स्थानु रेवच पश्चिमे खंड परशु वायव्या चंद्रशेखर उत्तरे गिरीशः पातु चैशान्य ईश्वर स्वयं उर्ध्वे मुंड सदा पातु चाध्य मृत्युंजय स्वयं जले स्थले चांदरीक्षे स्वप्ने जागरने सदा पिना कितुमा प्रीत्या भक्तम वैभक्त वत्सल य: सदा धारयेन्मर्त्य: शैवं कवचमुत्तमम् । न तस्य जायते क्वापि भयं शंभोरनुग्रहात् ॥ 30॥ इति अमोघ शिव कवच सम्पूर्ण ॥ 4
stotra mantraऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम । पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥ 4
mool mantraॐ राम राम ॐ राम राम परशु हस्ताय नमः
naam mantraराहु
kaamya mantraविधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥