भगवती चण्डिका काम्य मंत्र
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
अपार रूप, अखण्ड यश, हर क्षेत्र में विजय की प्राप्ति और शत्रुओं का सर्वनाश (ऐहिक सुख और मोक्ष दोनों की सिद्धि) 28।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
अपार रूप, अखण्ड यश, हर क्षेत्र में विजय की प्राप्ति और शत्रुओं का सर्वनाश (ऐहिक सुख और मोक्ष दोनों की सिद्धि) 28।
इस मंत्र से क्या होगा?
अपार रूप, अखण्ड यश, हर क्षेत्र में विजय की प्राप्ति और शत्रुओं का सर्वनाश (ऐहिक सुख और मोक्ष दोनों की सिद्धि)
जाप विधि
सकाम भाव से नित्य १ माला (१०८ बार) जप या सम्पुटित पाठ 28।
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ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा
kavach mantraनासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा । नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा । पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल: । आंगो पांगानी सर्वानी रक्षे में सूर्य नंदन इत्तेत कवच देव पठे सूर्य सुतस्य यह नतस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्य जह व्यय जन्म द्वितीय मृत्यु स्थान गतो पिवा कलस्थो गतो वापी सुप्रीतु सदाशनी अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्म द्वितीयगे। कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित्। इत्य तत कवचम दिव्यम सौरे निर्मित पुरा जन्म लग्न स्थिता दोषा सर्वान नाश्यते प्रभु इति शनि कवच संपूर्णं ॥ 20
beej mantraब्रं
ugra mantraअं ङं ञं णं नं मं
dhyan mantraविशोका वा ज्योतिष्मती
stotra mantraनारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥ 4