ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
उद्देश्य अनुसार मंत्र
श्री हनुमंत वीर शाबर रक्षा चौकी

श्री हनुमंत वीर शाबर रक्षा चौकी शाबर मंत्र

ओम चौकी हनुमत वीर की बाण ध्वजा फहराए मारू मारू मारुत सुत मुष्टिक शत्रु नसाय मेरे इष्ट रामचंद्र जी अगुवा हनुमंता वीर चौकी सुदर्शन चक्र की रक्षा करें शरीर टोना ब्रह्म भूत प्रेत संग डाईन डाकिनी सांप बिच्छू चोर बट सब कुछ निष्फल जाई 6

यह हनुमान परंपरा का एक अमोघ रक्षा अस्त्र है जिसका मुख्य प्रयोजन साधक या किसी पीड़ित व्यक्ति के चारों ओर एक अभेद्य 'चौकी' (तंत्र-सुरक्षा चक्र) का निर्माण करना है 6। इस मंत्र के निरंतर और अनुशासित प्रयो

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारशाबर मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

यह हनुमान परंपरा का एक अमोघ रक्षा अस्त्र है जिसका मुख्य प्रयोजन साधक या किसी पीड़ित व्यक्ति के चारों ओर एक अभेद्य 'चौकी' (तंत्र-सुरक्षा चक्र) का निर्माण करना है 6। इस मंत्र के निरंतर और अनुशासित प्रयोग से साधक के जीवन की समस्त विघ्न-बाधाएं स्वतः ही भस्म होने लगती हैं 7। इसकी तरंगों का प्रभाव इतना तीव्र है कि यह किसी भी प्रकार के काले जादू, टोने-टोटके, ब्रह्मराक्षस, भूत-प्रेत, डाकिनी, और पिशाचिनी जैसी घोर नकारात्मक शक्तियों को पूर्णतः निष्फल और शक्तिहीन कर देता है 6। इसके अतिरिक्त, भौतिक जगत की घोर बाधाओं जैसे विषैले जंतुओं (सांप, बिच्छू), चोरों और मार्ग के लुटेरों (चोर-बट) से भी यह शरीर और संपत्ति की प्रत्यक्ष रक्षा करता है 6। यदि परिवार का कोई सदस्य गलत मार्ग (व्यसन आदि) पर चला गया हो या उस पर नवग्रहों का घोर अशुभ प्रभाव पड़ रहा हो, तो इस मंत्र द्वारा अभिमंत्रित जल पिलाने से उसके मस्तिष्क और शरीर पर छाई हुई संपूर्ण नकारात्मक ऊर्जा का समूल नाश हो जाता है 8।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

यह हनुमान परंपरा का एक अमोघ रक्षा अस्त्र है जिसका मुख्य प्रयोजन साधक या किसी पीड़ित व्यक्ति के चारों ओर एक अभेद्य 'चौकी' (तंत्र-सुरक्षा चक्र) का निर्माण करना है 6

02

इस मंत्र के निरंतर और अनुशासित प्रयोग से साधक के जीवन की समस्त विघ्न-बाधाएं स्वतः ही भस्म होने लगती हैं 7

03

इसकी तरंगों का प्रभाव इतना तीव्र है कि यह किसी भी प्रकार के काले जादू, टोने-टोटके, ब्रह्मराक्षस, भूत-प्रेत, डाकिनी, और पिशाचिनी जैसी घोर नकारात्मक शक्तियों को पूर्णतः निष्फल और शक्तिहीन कर देता है 6

04

इसके अतिरिक्त, भौतिक जगत की घोर बाधाओं जैसे विषैले जंतुओं (सांप, बिच्छू), चोरों और मार्ग के लुटेरों (चोर-बट) से भी यह शरीर और संपत्ति की प्रत्यक्ष रक्षा करता है 6

जाप विधि

इस उग्र रक्षा विधान की सिद्धि हेतु किसी भी सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण, अमावस्या की मध्यरात्रि या किसी अत्यंत पवित्र व शुभ दिन का सावधानीपूर्वक चयन किया जाता है 7। साधक को सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होकर पूर्ण शारीरिक और मानसिक पवित्रता (ब्रह्मचर्य) धारण करनी होती है। श्री हनुमान जी की विधिवत षोडशोपचार या कम से कम पंचोपचार पूजा अर्चना (सिंदूर, चमेली का तेल, लाल पुष्प, और धूप-दीप) करने के पश्चात इस मंत्र का जप आरंभ किया जाता है 7। गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार इस विशिष्ट शाबर प्रयोग में जप की कोई कठोर अंतिम संख्या निर्धारित नहीं है; साधक अपनी क्षमता और आवश्यकता के अनुसार नित्य एक माला (108 बार), 27 बार, 54 बार, अथवा 5 से 10 माला का आजीवन संकल्प ले सकता है 7। इसे नित्य जीवन का अंग बनाकर जपने से साधक के चारों ओर ऊर्जा का एक स्थायी, अभेद्य आभामंडल निर्मित हो जाता है। विशेष अतीन्द्रिय संकट काल में, या जब घोर भय की अनुभूति हो रही हो, तब साधक इस मंत्र का 11 बार मानसिक या वाचिक जप करते हुए शुद्ध जल को अभिमंत्रित करता है 8। यह अभिमंत्रित जल पीड़ित व्यक्ति को पिलाया जा सकता है। जल अभिमंत्रित करते समय साधक को हनुमान जी से उस व्यक्ति का नाम लेकर क्षमा प्रार्थना अनिवार्य रूप से करनी चाहिए 8।

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नमस्कृत्य गणाधीशं सर्वविघ्ननिवारणम् । नृसिंहकवचं वक्ष्ये प्रह्लादेनोदितं पुरा । सर्वरक्षाकरं पुण्यं सर्वोपद्रवनाशनम् ॥ १॥ सर्व सम्पत्करं चैव स्वर्गमोक्षप्रदायकम् । ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमसिंहासनस्थितम् ॥ २॥ विवृतास्यं त्रिनयनं शरदिन्दुसमप्रभम् । लक्ष्म्यालिङ्गितवामाङ्गं विभूतिभिरुपाश्रितम् ॥ ३॥ चतुर्भुजं कोमलाङ्गं स्वर्णकुण्डलशोभितम् । सरोजशोभितोरस्कं रत्नकेयूरमुद्रितम् ॥ ४॥ तप्तकाञ्चनसंकाशं पीतनिर्मलवाससम् । इन्द्रादिसुरमौलिस्थस्फुरन्माणिक्यदीप्तिभिः ॥ ५॥ विराजितपदद्वन्द्वं शङ्खचक्रादि हेतिभिः । गरुत्मता च विनयात् स्तूयमानं मुदान्वितम् ॥ ६॥ स्वहृत्कमलसंवासं कृत्वा तु कवचं पठेत् । नृसिंहो मे शिरः पातु लोकरक्षार्थसम्भवः ॥ ७॥ सर्वगोऽपि स्तम्भवासः भालं मे रक्षतु ध्वनिम् । नृसिंहो मे दृशौ पातु सोमसूर्याग्निलोचनः ॥ ८॥ स्मृतिं मे पातु नृहरिर्मुनिवर्यस्तुतिप्रियः । नासं मे सिंहनासस्तु मुखं लक्ष्मीमुखप्रियः ॥ ९॥ सर्वविद्याधिपः पातु नृसिंहो रसनां मम । वक्त्रं पात्विन्दुवदनं सदा प्रह्लादवन्दितः ॥ १०॥ नृसिंहः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ भूभरान्तकृत् । दिव्यास्त्रशोभितभुजो नृसिंहः पातु मे भुजौ ॥ ११॥ करौ मे देववरदो नृसिंहः पातु सर्वतः । हृदयं योगिसाध्यश्च निवासं पातु मे हरिः ॥ १२॥ मध्यं पातु हिरण्याक्षवक्षःकुक्षिविदारणः । नाभिं मे पातु नृहरिः स्वनाभि ब्रह्मसंस्तुतः ॥ १३॥ ब्रह्माण्डकोटयः कट्यां यस्यासौ पातु मे कटिम् । गुह्यं मे गुह्यानां मन्त्राणां गुह्यरूपदृक् ॥ १४॥ ऊरु मनोभवः पातु जानुनी नररूपधृक् । जङ्घे पातु धराभारहर्ता योऽसौ नृकेसरी ॥ १५॥ सुरराज्यप्रदः पातु पादौ मे नृहरीश्वरः । सहस्रशीर्षा पुरुषः पातु मे सर्वशस्तनुम् ॥ १६॥ महोग्रः पूर्वतः पातु महावीराग्रजोऽग्नितः । महाविष्णुर्दक्षिणे तु महाज्वालस्तु नैरृतौ ॥ १७॥ पश्चिमे पातु सर्वेशो दिशि मे सर्वतोमुखः । नृसिंहः पातु वायव्यां सौम्यां भीषणविग्रहः ॥ १८॥ ईशान्यां पातु भद्रो मे सर्वमङ्गलदायकः । संसारभयतः पातु मृत्योर्मृत्युर्नृकेसरी ॥ १९॥ इदं नृसिंहकवचं प्रह्लादमुखमण्डितम् । भक्तिमान् यः पठेन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २०॥ ॐ उग्रं उग्रं महाविष्णुं सकलाधारं सर्वतोमुखम् । नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्युं मृत्युं नमाम्यहम् । 2

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