माता कामाख्या (नजर एवं तंत्र बाधा निवारण) शाबर मंत्र
ओम कलीम कामाख्या नजर तोड़े बंधन तोड़े बाधा तोड़े शत्रु की बुद्धि तोड़े ना तोड़े तो उमानंद भैरव की आन 17
इस मंत्र का प्रधान प्रयोजन अत्यंत जटिल और मायावी तांत्रिक बंधनों, गंभीर नजर दोष, और जीवन की अदृश्य बाधाओं का भेदन कर उन्हें छिन्न-भिन्न करना है 17। यह मंत्र केवल रक्षा ही नहीं करता, अपितु यह सीधे शत्र
जप, संकल्प और उपासना संकेत
जप काउंटर लोड हो रहा है...
यह मंत्र क्यों?
इस मंत्र का प्रधान प्रयोजन अत्यंत जटिल और मायावी तांत्रिक बंधनों, गंभीर नजर दोष, और जीवन की अदृश्य बाधाओं का भेदन कर उन्हें छिन्न-भिन्न करना है 17। यह मंत्र केवल रक्षा ही नहीं करता, अपितु यह सीधे शत्रु के मस्तिष्क और उसकी कुबुद्धि (शत्रु की बुद्धि तोड़े) पर प्रहार करता है जिससे वह साधक के विरुद्ध भविष्य में कोई षड्यंत्र रचने में शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम हो जाता है। इसमें उमानंद भैरव (जो कामाख्या के मुख्य भैरव और रक्षक हैं) की आन दी गई है। उमानंद भैरव तंत्र के किसी भी जटिल से जटिल बंधन को तत्क्षण काटने की प्रचंड संहारक ऊर्जा रखते हैं, जिसके कारण इस मंत्र के प्रयोग से बड़ी से बड़ी तांत्रिक बाधा पलक झपकते टूट जाती है 17।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस मंत्र का प्रधान प्रयोजन अत्यंत जटिल और मायावी तांत्रिक बंधनों, गंभीर नजर दोष, और जीवन की अदृश्य बाधाओं का भेदन कर उन्हें छिन्न-भिन्न करना है 17
यह मंत्र केवल रक्षा ही नहीं करता, अपितु यह सीधे शत्रु के मस्तिष्क और उसकी कुबुद्धि (शत्रु की बुद्धि तोड़े) पर प्रहार करता है जिससे वह साधक के विरुद्ध भविष्य में कोई षड्यंत्र रचने में शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम हो जाता है
इसमें उमानंद भैरव (जो कामाख्या के मुख्य भैरव और रक्षक हैं) की आन दी गई है
उमानंद भैरव तंत्र के किसी भी जटिल से जटिल बंधन को तत्क्षण काटने की प्रचंड संहारक ऊर्जा रखते हैं, जिसके कारण इस मंत्र के प्रयोग से बड़ी से बड़ी तांत्रिक बाधा पलक झपकते टूट जाती है
जाप विधि
कामाख्या तंत्र के इस मारक और बंधन-नाशक मंत्र के जप हेतु सबसे शुभ और जाग्रत समय प्रातः काल (ब्रह्म मुहूर्त) 4:00 से 6:00 बजे के मध्य या रात्रि का प्रथम पहर 8:00 से 10:00 बजे का माना गया है, जब ब्रह्मांडीय ऊर्जाएं संक्रमण काल में होती हैं 17। साधक को पूर्णतः सात्विक जीवन शैली अपनानी होती है, जिसमें भोजन एक ही समय किया जाता है (मांस, मदिरा, और मादक वस्तुओं का पूर्ण निषेध है)। साधना स्थल पर प्राण-प्रतिष्ठित कामाख्या यंत्र स्थापित करना आवश्यक है। लाल रंग के ऊनी आसन पर बैठकर और देवी को लाल पुष्प एवं मीठे फलों का नैवेद्य अर्पित कर, लाल चंदन की माला से इस मंत्र का निरंतर जप किया जाता है 17। संपूर्ण साधना काल में काले या नीले वस्त्र पहनना पूर्णतः वर्जित है। अनुष्ठान का समय एक ही होना चाहिए; समय और स्थान में परिवर्तन किए बिना एक ही समय पर बैठना इस अनुष्ठान की सफलता सुनिश्चित करता है 17। इस अत्यंत उग्र ऊर्जा को संभालने हेतु इसे किसी सिद्ध गुरु से दीक्षा लेकर ही करना चाहिए।
विशेष टिप्पणियाँ
अलग-अलग श्रेणियों से
हर श्रेणी से एक चुनिंदा मंत्र — नया खोजें
ॐ ह्रीं ह्रीं हूं हूं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा
naam mantraसुरेंद्र
vaidik mantraॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥
kavach mantraनमस्कृत्य गणाधीशं सर्वविघ्ननिवारणम् । नृसिंहकवचं वक्ष्ये प्रह्लादेनोदितं पुरा । सर्वरक्षाकरं पुण्यं सर्वोपद्रवनाशनम् ॥ १॥ सर्व सम्पत्करं चैव स्वर्गमोक्षप्रदायकम् । ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमसिंहासनस्थितम् ॥ २॥ विवृतास्यं त्रिनयनं शरदिन्दुसमप्रभम् । लक्ष्म्यालिङ्गितवामाङ्गं विभूतिभिरुपाश्रितम् ॥ ३॥ चतुर्भुजं कोमलाङ्गं स्वर्णकुण्डलशोभितम् । सरोजशोभितोरस्कं रत्नकेयूरमुद्रितम् ॥ ४॥ तप्तकाञ्चनसंकाशं पीतनिर्मलवाससम् । इन्द्रादिसुरमौलिस्थस्फुरन्माणिक्यदीप्तिभिः ॥ ५॥ विराजितपदद्वन्द्वं शङ्खचक्रादि हेतिभिः । गरुत्मता च विनयात् स्तूयमानं मुदान्वितम् ॥ ६॥ स्वहृत्कमलसंवासं कृत्वा तु कवचं पठेत् । नृसिंहो मे शिरः पातु लोकरक्षार्थसम्भवः ॥ ७॥ सर्वगोऽपि स्तम्भवासः भालं मे रक्षतु ध्वनिम् । नृसिंहो मे दृशौ पातु सोमसूर्याग्निलोचनः ॥ ८॥ स्मृतिं मे पातु नृहरिर्मुनिवर्यस्तुतिप्रियः । नासं मे सिंहनासस्तु मुखं लक्ष्मीमुखप्रियः ॥ ९॥ सर्वविद्याधिपः पातु नृसिंहो रसनां मम । वक्त्रं पात्विन्दुवदनं सदा प्रह्लादवन्दितः ॥ १०॥ नृसिंहः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ भूभरान्तकृत् । दिव्यास्त्रशोभितभुजो नृसिंहः पातु मे भुजौ ॥ ११॥ करौ मे देववरदो नृसिंहः पातु सर्वतः । हृदयं योगिसाध्यश्च निवासं पातु मे हरिः ॥ १२॥ मध्यं पातु हिरण्याक्षवक्षःकुक्षिविदारणः । नाभिं मे पातु नृहरिः स्वनाभि ब्रह्मसंस्तुतः ॥ १३॥ ब्रह्माण्डकोटयः कट्यां यस्यासौ पातु मे कटिम् । गुह्यं मे गुह्यानां मन्त्राणां गुह्यरूपदृक् ॥ १४॥ ऊरु मनोभवः पातु जानुनी नररूपधृक् । जङ्घे पातु धराभारहर्ता योऽसौ नृकेसरी ॥ १५॥ सुरराज्यप्रदः पातु पादौ मे नृहरीश्वरः । सहस्रशीर्षा पुरुषः पातु मे सर्वशस्तनुम् ॥ १६॥ महोग्रः पूर्वतः पातु महावीराग्रजोऽग्नितः । महाविष्णुर्दक्षिणे तु महाज्वालस्तु नैरृतौ ॥ १७॥ पश्चिमे पातु सर्वेशो दिशि मे सर्वतोमुखः । नृसिंहः पातु वायव्यां सौम्यां भीषणविग्रहः ॥ १८॥ ईशान्यां पातु भद्रो मे सर्वमङ्गलदायकः । संसारभयतः पातु मृत्योर्मृत्युर्नृकेसरी ॥ १९॥ इदं नृसिंहकवचं प्रह्लादमुखमण्डितम् । भक्तिमान् यः पठेन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २०॥ ॐ उग्रं उग्रं महाविष्णुं सकलाधारं सर्वतोमुखम् । नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्युं मृत्युं नमाम्यहम् । 2
tantrik mantraॐ श्रीं ग्लौं फट्
shanti mantraॐ स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः । गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥