ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
उद्देश्य अनुसार मंत्र
मरघट कालिका एवं अघोरी कीनाराम मारण परंपरा

मरघट कालिका एवं अघोरी कीनाराम मारण परंपरा शाबर मंत्र

ॐ नमो काली कंकाली पीती भर भर रक्त प्याली चाम की गठड़ी हाड़ की माला भजो आनंद सुंदरी बाला भरपूर वसन कर ले उठाई काम क्रोध कलिका माई लेके अपनी भेंट कड़ाई अमुक की छाती घात चलाई घाट में मरघट कालिका आई कालिका ने अमुक की कच्ची कलेजी खाई न खाई तो कीनाराम औघड़ की दुहाई 12

इस मंत्र का मुख्य और एकमात्र तांत्रिक प्रयोजन अघोर मारण और भयंकरतम शत्रु का पूर्णतः विनाश है 12। मंत्र के निरंतर उग्र जप से उत्पन्न घर्षण ऊर्जा सीधे लक्ष्य के प्राण-कोष (हृदय और मस्तिष्क) पर आघात करती

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारशाबर मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

इस मंत्र का मुख्य और एकमात्र तांत्रिक प्रयोजन अघोर मारण और भयंकरतम शत्रु का पूर्णतः विनाश है 12। मंत्र के निरंतर उग्र जप से उत्पन्न घर्षण ऊर्जा सीधे लक्ष्य के प्राण-कोष (हृदय और मस्तिष्क) पर आघात करती है। अघोर तंत्र के सिद्धांतों के अनुसार, 2 घंटे के भीतर ही शत्रु को अपने स्थान पर भयंकर शारीरिक कष्ट, बेचैनी और छाती में तीव्र आघात महसूस होने लगता है, जो अंततः प्राण-हानि में परिणत होता है 12। यह कोई सामान्य तांत्रिक प्रयोग नहीं है; यह 'मरघट कालिका' का साक्षात् प्रकटीकरण है जिसे 'कीनाराम औघड़' (अघोर परंपरा के महानतम संत) की कठोर दुहाई देकर 'कच्ची कलेजी खाने' (अर्थात प्राण हरण करने) के लिए बाध्य किया जाता है। इसका प्रयोग केवल तभी किया जाता है जब धर्म और स्वयं की प्राण रक्षा का अन्य कोई मार्ग शेष न हो 12।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

इस मंत्र का मुख्य और एकमात्र तांत्रिक प्रयोजन अघोर मारण और भयंकरतम शत्रु का पूर्णतः विनाश है 12

02

मंत्र के निरंतर उग्र जप से उत्पन्न घर्षण ऊर्जा सीधे लक्ष्य के प्राण-कोष (हृदय और मस्तिष्क) पर आघात करती है

03

अघोर तंत्र के सिद्धांतों के अनुसार, 2 घंटे के भीतर ही शत्रु को अपने स्थान पर भयंकर शारीरिक कष्ट, बेचैनी और छाती में तीव्र आघात महसूस होने लगता है, जो अंततः प्राण-हानि में परिणत होता है 12

04

यह कोई सामान्य तांत्रिक प्रयोग नहीं है

जाप विधि

अघोर परंपरा के इस अत्यंत उग्र, निषिद्ध और गोपनीय मारण प्रयोग को केवल मध्यरात्रि (12:00 से 2:00 बजे के बीच) श्मशान घाट या किसी पूर्णतः एकांत, निर्जन और अंधकारमय कक्ष में ही संपन्न किया जाता है 12। अघोर विधान के अनुसार, समाज के बनाए कृत्रिम आवरणों को तोड़ने और ऊर्जा के सीधे प्रवाह हेतु साधक को वस्त्रहीन (नग्न अवस्था) होकर इस साधना को करना अनिवार्य होता है 12। जप के दौरान साधक का ध्यान पूर्णतः अपने लक्ष्य (शत्रु) पर केंद्रित होना चाहिए। यदि इस मंत्र का जप 'अमुक' व्यक्ति (शत्रु) के चित्र के समक्ष किया जाए, तो ऊर्जा का प्रवाह अधिक सटीक और अचूक होता है। यह अनुष्ठान 'अघोरी चौकी' के माध्यम से कार्य करता है, जिसमें श्मशान की संपूर्ण नकारात्मक और तामसिक ऊर्जा को एक तंत्र-सूत्र में पिरोया जाता है 12। इस साधना में एक सक्षम गुरु का सान्निध्य और पूर्ण रक्षा-मंत्र (सुरक्षा घेरा) का पूर्व-सिद्ध होना अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा ऊर्जा का विपरीत प्रभाव (Rebound) साधक के प्राण तत्काल हर सकता है। जप की अवधि निरंतर 2 घंटे तक चलती है, जिसमें साधक के मन में रत्ती भर भी भय, संकोच या शत्रु के प्रति दया का भाव नहीं आना चाहिए 12।

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