गुरु गोरखनाथ रोग एवं ज्वर निवारण शाबर मंत्र
गुरु गोरखनाथ की दुहाई। रोग भागे, ज्वर सिधाए। शब्द सांचा, पीर मेरा पावना 13
इस मंत्र का एकमात्र और अत्यंत पवित्र प्रयोजन शारीरिक व्याधियों, विशेषकर पुराने और औषधियों से न उतरने वाले भयंकर ज्वर (Fever) और अज्ञात तांत्रिक रोगों का तत्काल निवारण करना है 13। तांत्रिक दृष्टिकोण से
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस मंत्र का एकमात्र और अत्यंत पवित्र प्रयोजन शारीरिक व्याधियों, विशेषकर पुराने और औषधियों से न उतरने वाले भयंकर ज्वर (Fever) और अज्ञात तांत्रिक रोगों का तत्काल निवारण करना है 13। तांत्रिक दृष्टिकोण से, कई रोग नकारात्मक ऊर्जाओं के प्रवेश से उत्पन्न होते हैं। गुरु गोरखनाथ की दुहाई के माध्यम से शरीर के ताप और वात-पित्त-कफ के असंतुलन को उत्पन्न करने वाली उन नकारात्मक शक्तियों को रोगी का शरीर छोड़ने पर विवश कर दिया जाता है, जिससे रोग तत्काल भागता है (रोग भागे) और रोगी अत्यंत शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता है 13।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस मंत्र का एकमात्र और अत्यंत पवित्र प्रयोजन शारीरिक व्याधियों, विशेषकर पुराने और औषधियों से न उतरने वाले भयंकर ज्वर (Fever) और अज्ञात तांत्रिक रोगों का तत्काल निवारण करना है 13
तांत्रिक दृष्टिकोण से, कई रोग नकारात्मक ऊर्जाओं के प्रवेश से उत्पन्न होते हैं
गुरु गोरखनाथ की दुहाई के माध्यम से शरीर के ताप और वात-पित्त-कफ के असंतुलन को उत्पन्न करने वाली उन नकारात्मक शक्तियों को रोगी का शरीर छोड़ने पर विवश कर दिया जाता है, जिससे रोग तत्काल भागता है (रोग भागे) और रोगी अत्यंत शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता है
जाप विधि
यह नाथ परंपरा की एक अत्यंत ही जन-कल्याणकारी और सात्विक लोक-साधना है। इसे किसी भी शुभ दिन या रोगी की विकट स्थिति में तत्काल सिद्ध और प्रयुक्त किया जा सकता है। जब कोई व्यक्ति असाध्य ज्वर (बुखार) या अज्ञात शारीरिक पीड़ा से ग्रस्त हो, तब साधक एक स्वच्छ पात्र (विशेषकर तांबे या कांसे के पात्र) में शुद्ध जल लेता है। उस जल की सतह पर दृष्टि स्थिर करते हुए (Tratak) इस मंत्र का 108 बार लगातार लयबद्ध जप किया जाता है। इस प्रक्रिया से जल के भीतर एक विशिष्ट आणविक और तांत्रिक कंपन (Acoustic Vibration) उत्पन्न हो जाता है 13। तत्पश्चात इस अमोघ अभिमंत्रित जल को रोगी के शरीर पर सात बार छिड़का जाता है, और कुछ मात्रा में उसे पीने के लिए दिया जाता है। यदि ज्वर मस्तिष्क पर चढ़ गया हो या रोगी अचेत अवस्था में हो, तो इस मंत्र को सीधे रोगी के कान में भी 11 या 21 बार बुदबुदाया जाता है 13।
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